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इस तस्‍वीर से पाकिस्‍तान को लगेगी मिर्ची, तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन ने मिलाया पीएम मोदी से हाथ

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इस्लामाबाद

उजबेकिस्तान के समरकंद शहर में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) का 22वां शिखर सम्मेलन चल रहा है। चीन, रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, उजबेकिस्तान, भारत और पाकिस्तान इसमें हिस्सा ले रहे हैं। सहयोगी के रूप में कई अन्य देश भी एससीओ समिट में मौजूद हैं। शुक्रवार को शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने उजबेकिस्तान पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन से हुई। पाकिस्तान की वजह से भारत और तुर्की के संबंध अक्सर तनावपूर्ण रहते हैं। पाकिस्तान मुस्लिम देश तुर्की को सऊदी अरब से भी बड़ा दोस्त मानता है। ऐसे में मोदी और एर्दोगन की नजदीकियों से शिखर सम्मेलन में मौजूद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को मिर्ची लग सकती है।

प्रधानमंत्री कार्यालय ने ट्वीट कर बताया कि उजबेकिस्तान के समरकंद में एससीओ शिखर सम्मेलन से इतर पीएम मोदी ने एर्दोगन के साथ द्विपक्षीय बैठक की। बैठक में दोनों नेताओं ने कई क्षेत्रों में द्विपक्षी सहयोग को मजबूत करने के तरीकों पर चर्चा की। इससे पहले पीएम मोदी ने बैठक में अफगानिस्तान को मदद पहुंचाने में पाकिस्तान की ओर रोड़ा लगाने का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि सदस्य देशों को एक दूसरे को ट्रांजिट का अधिकार देना चाहिए। जवाब में शरीफ ने कहा कि हमें एक मजबूत कनेक्टिविट प्लान बनाना चाहिए, जिसमें मध्य एशिया के देशों की कनेक्टिविटी हो। ऐसे में पड़ोसी समेत सभी को पूरा ट्रांजिट का अधिकार मिल जाएगा।

पाकिस्तान के कंधे पर तुर्की की बंदूक
पाकिस्तान को भारत और तुर्की के बीच द्विपक्षीय बैठक की उम्मीद नहीं रही होगी जिसकी वजह तुर्की की पाकिस्तान संग दोस्ती और भारत के साथ तनावपूर्ण रिश्ते हैं। पिछले 8-10 साल में अंकारा और इस्लामाबाद के बीच दोस्ती गहरी हुई है। इसकी एक वजह भारत और सऊदी अरब के बीच बढ़ती नजदीकियां भी हैं। कश्मीर से अनुच्छेद 370 के खात्मे के बाद सऊदी की बेरूखी ने पाकिस्तान को तुर्की के और करीब कर दिया। वहीं, दूसरी ओर तुर्की इस्लामिक देशों का मसीहा बनने के लिए पाकिस्तान के कंधे पर बंदूक चलाना चाहता है।

पाकिस्तान और तुर्की की दोस्ती
पाकिस्तान में चाहें कोई भी सत्ता के शीर्ष पर बैठे, तुर्की के साथ उसके संबंध मधुर ही रहते हैं। इमरान खान और एर्दोगन की दोस्ती तीन साल मजबूत बनी रही और जब शहबाज शरीफ आए तो प्रधानमंत्री बनने के तीन महीने के भीतर ही वह अंकारा पहुंच गए। तुर्की और पाकिस्तान केवल रक्षा संबंधों में ही नहीं, बल्कि कूटनीतिक स्तर पर भी एक दूसरे का आंख बंदकर समर्थन करते हैं। हाल में ही जब ग्रीस के साथ भूमध्य सागर में सीमा विवाद हुआ तो पाकिस्तान ने बिना सच्चाई जाने खुलेआम तुर्की के पक्ष में समर्थन का ऐलान किया था।

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