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Wednesday, March 25, 2026
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जिस मिट्टी में जन्म लिया, वहीं विलीन हुआ ‘धरतीपुत्र’, नेता बनना आसान है, ‘नेताजी’ होना नहीं

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इटावा (सैफई)

चाचा, कहां जा रहे हैं? ‘नेता जी को देखन जाय रहे’। इतनी जल्दी में क्यों जा रहे हैं? ‘दो घंटा से पैदल चल रहे। जल्दी से वहां पहुंचनो है जहां हमारे नेताजी लेटे हैं। बस उनके दर्शन हो जाएं एक बार किसी तरह से, बस।’ यह कहते-कहते लगभग 70 साल के रामचरन की आंखें भर आती हैं। नाम के अलावा मैं कुछ और पूछ पाता कि वे आगे की ओर जा रही भीड़ में शामिल हो गए। हजारों की यह भीड़ उस मेला मैदान की ओर जा रही थी जहां नेता जी मुलायम सिंह यादव का शव अंतिम दर्शन के लिये रखा था।

मुलायम सिंह का शव सैफई के उनके घर से लगभग 11 बजे मेला मैदान के लिये निकला। साथ में हजारों की भीड़। जिस वाहन पर शव था, उसके साथ अखिलेश यादव सहित यादव परिवार का पूरा कुनबा भी था। मेला मैदान के ही दूसरे हिस्से में एक मंच पर दोपहर पर करीब साढ़े तीन बजे नेता जी को बेटे अखिलेश यादव ने मुखाग्नि दी और धरतीपुत्र के नाम से मशहूर उत्तर प्रदेश के तीन बार के मुख्यमंत्री, 10 बार विधायक, 7 बार सांसद और समाजवादी पार्टी के मुखिया रहे मुलायम सिंह यादव धरती में विलीन हो चुके हैं।

सोमवार 10 अक्टूबर को गुरुग्राम के मेदांता में उन्होंने आखिरी सांस ली। दोपहर बाद शव उनके पैतृक गांव इटावा के सैफई लाया गया। सोमवार शाम से ही जो हुजूम सैफई में उमड़ा, वह मंगलवार देर शाम तक भी कम ना हो सका। देशभर से मुलायम सिंह यादव के चाहने और उनके सिद्धांतों को मानने वाले हजारों लोग सैफई पहुंचे। नेता जी यहीं पैदा हुए और यहीं की मिट्टी में अर्पित हो गये। मुलायम सिंह यादव कैसे नेता थे, उसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि क्या पक्ष, क्या विपक्ष, हर दल के नेता सैफई पहुंचे और उन्होंने नेता जी को श्रद्धांजलि दी।

नेता जी के मायने क्या हैं?
हम जब सोमवार देर शाम पहुंचे तो लगा सैफई में जैसे कोई मेला चल रहा हो। नेता जी के घर पर सैकड़ों की संख्या में लोग पहुंचे थे। इटावा आनी वाली सड़कों पर गाड़ियों की लंबी कतारें थीं। होटल, ढाबे देर रात तक खुले रहे। रात से ही आने का सिलसिला जो शुरू हुआ, वह मंगलवार दिनभर चला। मेला ग्राउंड में हजारों की संख्या में लोग जुटे थे जहां 3 बजे पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिये रखा गया। वहां आए नेताजी को मानने, चाहने वाले लोगों ने बताया कि नेताजी के मायने क्या हैं और हर कोई मुलायम क्यों नहीं हो सकता।

इटावा के ही सुनील कुमार ने हमसे एक किस्सा साझा की। वे बताते हैं, ‘समाजवादी पार्टी के गठन के कुछ सालों बाद का किस्सा है। इटावा में पार्टी का सम्मेलन था। एक पंडाल बना हुआ था, उसी में सम्मेलन हो रहा था। सभी लोग नीचे फर्श पर बैठे हुए थे। जनेश्वर मिश्रा, मोहन सिंह, बेनी प्रसाद वर्मा जैसे बड़े नेता लोग वहां मंच पर बैठे हुए थे। उसी समय नेताजी पंडाल में आए और हम लोग आम कार्यकर्ता जहां बैठे हुए थे, वहीं पर मुलायम जी आकर बैठ गए। उनके साथ सुरक्षाकर्मी भी थे।’

सुनील आगे बोले, ‘हम लोगों को आश्चर्य हुआ। मंच से बाकी नेता लोग भी उतरकर आए और बोले कि अरे आप यहां क्यों बैठे हुए हैं। इस पर मुलायम ने कहा कि ये सम्मेलन इटावा में हो रहा है। मैं भले ही राष्ट्रीय अध्यक्ष हूं लेकिन यहां पर मैं मेजबान की भूमिका में ही हूं। फिर वह कुछ देर बैठने के बाद फिर मंच की तरफ चले गए। मैं 11 साल उनके साथ रहा। ऐसे बहुत किस्से हैं। उन्होंने मदद करने में कभी भी जाति और पार्टी नहीं देखी।’ वे आगे कहते हैं कि आज के समय में नेता होना तो आसान है। लेकिन नेता जी बनना मुश्किल है। आज के नेता उनके जैसा हो ही नहीं सकते।

बुजुर्ग और महिलाओं की संख्या रही सबसे ज्यादा
नेता जी को देखने वालों में बुजुर्ग और महिलाओं की संख्या खूब रही। नेता जी के अंतिम दर्शन करने आए इटावा के ही लगभग 75 वर्षीय राधेश्याम यादव इसकी वजह बताते हैं। वे कहते हैं, ‘नेता जी को हमने शुरू से देखा। वे जब वोट मांगने आते थे तो हमें नाम लेकर पुकारते थे। सीएम बनने के बाद भी वे जब भी सैफई में रहते, हमें उनसे मिलने से कोई रोकता नहीं था। हम उनसे लखनऊ जाकर मिलते। वे जमीनी नेता थे और अपने लोगों का हमेशा ख्याल रखते थे।’

संभल जिले की गुन्नौर तहसील के तरफरी गांव से आए 70 वर्षीय नवनीत राम यादव ने कहा, ‘मुलायम सिंह यादव हम लोगों के लिए आदर्श हैं। उनके साथ जो भी आदमी एक बार जुड़ जाता था, वो फिर उनको छोड़कर नहीं जा सकता था। नाराजगी हो सकती थी। लेकिन जब बात नेताजी की आती थी तो सब लोग एक हो जाते थे। नेताजी सर्वसमाज के लिए आदर्श स्थापित करके गए। उन्होंने दलितों, पिछड़ों, गरीबों को हमेशा उठाने का काम किया। उन्हें बराबरी का दर्जा दिया।’

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