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450 हेक्टेयर जमीन, 500 परिवार… इस जंगल में क्यों चला बुलडोजर?

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नई दिल्ली,

असम में एक बार फिर बुलडोजर चला है. इस बार लखीमपुर जिले में पावा जंगल में अतिक्रमण को हटाया गया है. इस कार्रवाई ने 500 परिवारों को बेघर कर दिया है. प्रशासन का दावा है कि ये लोग जंगल की जमीन पर अवैध कब्जा कर रह रहे थे. वहीं, लोग दावा कर रहे हैं कि वो सालों से यहां रह रहे थे.

जिन लोगों के घरों पर ढहाया गया है, उनमें ज्यादातर बंगाली बोलने वाले मुस्लिम हैं. उनका कहना है कि घर तोड़ने में प्रशासन ने इतनी जल्दी दिखाई कि वो अपना सामान भी नहीं समेट सके. उनका दावा है कि इस कार्रवाई में उनकी फसल भी बर्बाद हो गई. अधिकारियों का कहना है कि पावा रिजर्व फॉरेस्ट की 2,560.25 हेक्टेयर जमीन में से सिर्फ 29 हेक्टेयर जमीन ही ऐसी है जिसपर अतिक्रमण नहीं है. प्रशासन ने जंगल की 450 हेक्टेयर जमीन से अतिक्रमण हटाने के लिए मंगलवार को कार्रवाई शुरू की थी.

कितने घर तोड़े गए?

पुलिस अधिकारियों ने न्यूज एजेंसी को बताया कि पावा रिजर्व फॉरेस्ट की 450 हेक्टेयर जमीन पर अतिक्रमण हटाने से 500 से ज्यादा परिवार प्रभावित हुए हैं.मंगलवार को जंगल के मोगली गांव से 200 हेक्टेयर जमीन को खाली कराया गया था. यहां से 201 परिवारों के घर को तोड़ दिया गया था.वहीं, बुधवार को आधासोना गांव की 250 हेक्टेयर जमीन को खाली कराया गया. यहां करीब 299 परिवार रहते थे.

पर घर क्यों तोड़े गए?
लखीमपुर डिविजन के फॉरेस्ट अफसर अशोक कुमार देव चौधरी ने न्यूज एजेंसी को बताया कि पावा रिजर्व फॉरेस्ट की जमीन पर 701 परिवारों ने कब्जा कर लिया था.उन्होंने बताया कि जमीन पर अतिक्रमण करने वाले ये लोग असम के ही अलग-अलग हिस्सों से आए थे. इनमें कुछ ऐसे भी थे जो बाढ़ या कटाव के कारण विस्थापित हुए थे.

लखीमपुर के डिप्टी कमिश्नर सुमित सत्तावन ने बताया कि अतिक्रमण कर रह रहे लोगों को दो साल पहले वन विभाग और स्थानीय प्रशासन ने खाली करने का नोटिस दिया था. उनका दावा है कि लोगों से यहां से शांतिपूर्वक तरीके से चले जाने का अनुरोध किया था.

लोगों को क्या है कहना?
आधासोना गांव में रहने वाले एक व्यक्ति ने नाम न बताने की शर्त पर न्यूज एजेंसी को बताया कि उसका परिवार 28 साल से यहां रह रहा था.
उसने दावा किया कि इस साल खेती भी अच्छी हुई थी. बैंगन, गोभी और फूलगोभी उगाई थी. कुछ बाजार में बेच दी, लेकिन 70 फीसदी फसल इस अभियान में नष्ट हो गई.

ऑल असम माइनोरिटी स्टूडेंट्स यूनियन (AAMSU) ने प्रशासन के इस अभियान को ‘अमानवीय’ और ‘एकतरफा’ बताया है. संगठन ने लखीमपुर के सोनापुर में इसके खिलाफ प्रदर्शन भी किया.हालांकि, सीनियर अधिकारियों ने न्यूज एजेंसी को बताया कि लोगों को नवंबर 2021 से कई बार जमीन खाली करने का नोटिस भेजा गया था. पिछले साल 7 सितंबर को उन्हें फाइनल नोटिस दिया गया था और कहा गया था कि वो फसल न उगाएं, लेकिन उन्होंने बात नहीं मानी.

अधिकारी का कहना है कि पिछले साल नाओबोइचा के सर्कल अधिकारी ने अतिक्रमणकारियों से संपर्क किया था और उनसे शांतिपूर्वक और अपनी मर्जी से जमीन खाली करने को कहा था.अधिकारियों का दावा है कि पिछले साल 84 परिवारों ने जमीन पर कब्जे को लेकर दस्तावेज भी जमा कराए थे, लेकिन जांच में ये फर्जी साबित हुए थे.

हिंदू परिवारों के घर नहीं उजाड़े?
प्रशासन ने जिनके घर तोड़ दिए, उनमें से कुछ ऐसे भी हैं जिनका दावा है कि यहां रहने वाले 500 हिंदू परिवारों के घरों को नहीं ढहाया गया है. एक व्यक्ति ने दावा कि अगर ये असल में अतिक्रमण है तो फिर हिंदू परिवारों को भी यहां से हटाया जाए.इस पर एक सीनियर अधिकारी कहना है कि यहां रहने वाले हिंदू परिवारों में ज्यादातर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के हैं और उन्होंने 2016 में पुनर्वास के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था.

हिमंता सरकार की तीसरी बड़ी कार्रवाई
मई 2021 में दोबारा बीजेपी सरकार आने के बाद हिमंता बिस्वा सरमा को मुख्यमंत्री बनाया गया था. उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद से डेढ़ साल में कई बार बुलडोजर चला. उनकी सरकार में अतिक्रमण के खिलाफ ये तीसरी बड़ी कार्रवाई बताई जा रही है.पिछले साल 19 दिसंबर को नागांव के बटद्रवा में 1200 बीघा से ज्यादा जमीन को खाली कराया गया था. इस दौरान पांच हजार से ज्यादा अतिक्रमणकारियों को हटाया गया था.

इससे पहले 20 सितंबर 2021 को दरांग के ढालपुर इलाके से अतिक्रमण हटाया गया था. यहां की करीब 25 हजार एकड़ जमीन पर तीन हजार परिवारों का कब्जा था. इस कार्रवाई के बाद हिंसा भी हुई थी जिसमें दो लोगों की मौत हो गई थी और 20 से ज्यादा लोग घायल हुए थे.अतिक्रमण की कार्रवाई पर जब विपक्ष ने सरकार को घेरा तो पिछले साल 21 दिसंबर को सीएम सरमा ने विधानसभा में कहा कि जब तक बीजेपी सत्ता में है तब तक सरकारी और जंगल की जमीन से अवैध कब्जे हटाने का अभियान जारी रहेगा.

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