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सुप्रीम कोर्ट पर तंज, केशवानंद भारती केस का जिक्र, VP धनखड़ बोले- क्या हम लोकतांत्रिक देश हैं?

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नई दिल्ली,

न्यायपालिका बनाम विधायिका की बहस पर अपनी राय देते हुए उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने 1973 के चर्चित केशवानंद भारती केस का जिक्र किया है. उन्होंने कहा कि इस फैसले ने गलत मिसाल पेश कर दी है और अगर कोई भी अथॉरिटी संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति पर सवाल उठाती है, तो यह कहना मुश्किल होगा कि ‘हम एक लोकतांत्रिक राष्ट्र हैं.’

इसके अलावा उपराष्ट्रपति धनखड़ ने कहा कि न्यायिक मंचों से जनता के लिए दिखावा अच्छा नहीं है. जगदीप धनखड़ ने कहा कि उन्हें तब आश्चर्य हुआ जब सुप्रीम कोर्ट के जजों ने अटॉर्नी जनरल को अपनी नाराजगी उच्च संवैधानिक अधिकारियों को बताने के लिए कहा था.

बता दें केशवानंद भारती केस में सुप्रीम कोर्ट ने बेसिक स्ट्रक्चर (मूल ढांचे) का सिद्धांत दिया था. भारत में कई फैसलों का आधार बनने वाली इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संसद चाहे तो संविधान में संशोधन कर सकती है लेकिन संविधान के मूल ढांचे में बदलाव नहीं कर सकती है.

केशवानंद भारती केस के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संसद के पास अनुच्छेद 368 के तहत संविधान में संशोधन करने की शक्ति तो है लेकिन ये शक्ति असीमित नहीं है. संविधान का संशोधन तभी तक मान्य है जब तक ये बदलाव संविधान की प्रस्तावना के मूल ढांचे को नहीं बदलता है.

लेकिन अब लगभग 50 साल बाद उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने इस फैसले की आलोचना की है और कहा है कि अगर कोई भी शक्ति संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति पर सवाल उठाती है तो फिर यह कह पाना मुश्किल होगा कि हम एक लोकतांत्रिक देश है.

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2015 में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) अधिनियम को रद्द करने की फिर से आलोचना की, और कहा कि वह केशवानंद भारती मामले के फैसले से इत्तेफाक नहीं रखते हैं कि संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन इसकी मूल संरचना में नहीं.

केशवानंद भारती केस में दिया गया बेसिक स्ट्रक्चर का सिद्धांत कई संवैधानिक संशोधनों को सुप्रीम कोर्ट में खारिज करने का आधार बन गया. इसी सिद्धांत के बिनाह पर राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) कानून को खारिज कर दिया गया था. NJAC के इस फैसले में शीर्ष अदालत ने कहा था कि ये कानून न्यायपालिका की स्वतंत्रता के सिद्धांत का उल्लंघन करती है जो कि संविधान का मूल सिद्धांत का भी उल्लंघन है.

जयपुर में 83वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन को संबोधित करते हुए धनखड़ ने कहा कि संसदीय संप्रभुता और स्वायत्तता लोकतंत्र के अस्तित्व के लिए सर्वोपरि है और कार्यपालिका या न्यायपालिका को इसके साथ किसी तरह का समझौता करने की इजाजत नहीं दी जा सकती है.

उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के महासचिव जगदीप धनखड़ ने कहा, “1973 में गलत परंपरा शुरू हो गई. 1973 में केशवानंद भारती केस में सुप्रीम कोर्ट ने बेसिक स्ट्रक्टर का विचार दिया और कहा कि संसद संविधान में संशोधन तो कर सकती है लेकिन इसके मूल ढांचे को नहीं बदल सकती है. न्यायपालिका के प्रति उचित सम्मान जताते हुए मैं कहना चाहूंगा कि मैं इस विचार से सहमत नहीं हूं.” बता दें कि उपराष्ट्रपति स्वयं भी सुप्रीम कोर्ट के वकील रह चुके हैं.

आगे उन्होंने कहा, “क्या संसद को अनुमति दी जा सकती है कि उसके फैसले की किसी भी अथॉरिटी द्वारा समीक्षा की जा सकती है. कार्यपालिका को कानूनों का पालन करना होता है और न्यायपालिका कानून बनाने में हस्तक्षेप नहीं कर सकती है.”

जगदीप धनखड़ ने कहा देश के लोकतांत्रिक ढांचे की चिंता करते हुए कहा, “यदि कोई संस्था किसी भी आधार पर संसद द्वारा पारित कानून को खारिज करती है तो यह लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं होगा और यह कहना मुश्किल होगा कि हम एक लोकतांत्रिक राष्ट्र हैं.”उन्होंने आगे कहा कि संसदीय संप्रभुता को कार्यपालिका या न्यायपालिका द्वारा कमजोर या समझौता करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है.

इस कार्यक्रम के दौरान उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने सुप्रीम कोर्ट पर कटाक्ष करते हुए कहा कि न्यायिक मंचों से जनता के लिए दिखावा अच्छा नहीं है. उपराष्ट्रपति की ये टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के एक महीने बाद आई है, जब जस्टिस एसके कौल की अगुवाई वाली पीठ ने कॉलेजियम प्रणाली के खिलाफ कार्यपालिका के सदस्यों द्वारा की गई टिप्पणियों पर नाराजगी व्यक्त की थी.

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