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100 दिन की ‘यू-टर्न सरकार’ वाली छवि को छुपाने के लिए लाया गया है वन नेशन वन इलेक्‍शन?

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नई दिल्ली,

केंद्र सरकार ने बुधवार को लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और स्थानीय निकायों के चुनावों को एक साथ कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी, जिसके तहत पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ पर उच्च स्तरीय समिति के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई.सवाल यह उठता है कि भारतीय जनता पार्टी को देश में एक साथ सभी चुनाव कराने की इतनी जल्दी क्यों मची हुई है.जबकि वह जानती है कि इस बिल को पास कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में उसके पास पर्याप्त संख्या नहीं है. कहीं ऐसा तो नहीं है कि केंद्र में नई सरकार बनने के बाद पिछले सौ दिनों में कई मुद्दों पर सरकार ने जो यू टर्न लिया है और उसके चलते सरकार की जो साख गिरी है उससे छुटकारा पाने का जतन कर रही है सरकार? क्योंकि ऐसे समय में जब लगातार सरकार की लोकप्रियता कम हो रही है एक ऐसा विधेयक पेश किया जा रहा है जिसके पास होने की उम्मीद बहुत ही कम है. आइये देखते हैं कि सरकार की मंशा क्या है?

1-जनता के सामने यह साबित करना है कि सभी यू टर्न मजबूरी थे, हमें जल्द ही पूर्ण बहुमत चाहिए
पिछले दिनों जिस तरह सरकार ने वक्फ बोर्ड संशोधन विधेयक, बजट के कुछ प्रस्तावों, दलित सब कोटा, लैटरल एंट्री आदि पर यू टर्न लिया है उससे जनता में बीजेपी की साख कम हुई है. भारतीय जनता पार्टी अपनी खोई हुई साख को फिर से हासिल करना चाहती है. इसके लिए संभवतया वो दो तरह से काम कर रही है. पहली ये कि एक देश- एक चुनाव जैसे बिल संसद में पेश करें जिससे जनता के बीच यह संदेश जाए कि सरकार देश की भलाई के लिए काम करना चाहती है. हर कोशिश कर के बिल पास कराने की कोशिश होगी. दूसरे अगर विपक्ष इस बिल को पास नहीं होने देता तो बीजपी जनता के बीच जाकर कहेगी उसे पूर्ण बहुमत की जरूरत है. बीजेपी जनता के बीच ये भी कहेगी कि एक देश-एक चुनाव जैसा बिल बीजेपी अपने समर्थकों के लिए नहीं ला रही है. ये पूरे देश के फायदे के लिए है. और जनता जब तक पार्टी को भरपूर समर्थन नहीं देगी सरकार इस तरह के जनहित कारी कार्य नहीं कर पाएगी.सरकार यही नीति वक्फ बोर्ड संशोधन बिल के लिए भी अपनाएगी.

2- बीजेपी ये बताना चाहती है कि तमाम रोल बैक के बावजूद हम अपने मुद्दों पर कायम हैं
बीजेपी जनता के बीच यह संदेश फैलाना चाहती है कि पिछले दिनों सरकार को कई मुद्दे पर यू टर्न लेना पड़ा पर सरकार पीछे नहीं हटी है. वो अपने किए गए वादों को लेकर गंभीर है. इन वादों को पूरा करने के लिए सरकार किसी भी स्तर पर जाने को तैयार है. एक देश-एक चुनाव हो या वक्फ बोर्ड संशोधन कानून की ही बात नहीं है और भी बिल भविष्य में लाए जाएंगे. जैसे समान सिविल संहिता के लिए भी कानून भारत सरकार आज नहीं तो कल लाएगी ही. आम मतदाता को यह संदेश देना है कि बीजेपी को सीटें भले ही कम मिली हैं पर जनता से जो वादा किया था उसे निभाने के लिए लगातार प्रयास होता रहेगा.

3-वन नेशन-वन इलेक्शन एक माइलस्टोन होगा जो बीजेपी राज की उपलब्धि के रूप में याद किया जाएगा
इसमें कोई दो राय नहीं हो सकता कि एक देश-एक चुनाव देश के लिए बहुत जरूरी है. भारत में पहले 5 लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव एक साथ ही हुए हैं. अमेरिका से लेकर दुनिया के करीब सभी ताकतवर देशों में चुनाव केंद्र और राज्यों में एक साथ ही होता है. मोदी सरकार अगर ये कानून बनाने में सफल होती है तो बीजेपी राज में संपन्न हुए कुछ खास कार्य जैसे अनुच्छेद 370 को खत्म करना , राम मंदिर निर्माण आदि की श्रेणी में यह काम भी शामिल हो जाएगा.

4-बीजेपी के लिए अगला चुनाव आसान हो जाएगा
इस साल लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की सीटों में जिस तरह की कमी आई है उससे यही लगता है कि अगली बार ये संख्या और कम हो सकती है.यह भी हो सकता है कि केंद्र में जोड़ तोड़कर के फिर सरकार बन भी जाए तो राज्यों में चुनाव जीतना मुश्किल हो सकता है.पर जब पूरे देश में एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव होंगे तो बीजेपी सभी दलों पर भारी पड़ सकती है. इसका कारण है प्रधानमंत्री नरेंद्र की पैन इंडिया लीडर की छवि. बीजेपी इसके जरिए बहुत से राज्यों में चुनाव जीतने में कामयाब हो सकती है.

5-बीजेपी इसे राजनीति में शुचिता लाने के सार्थक प्रयास के रूप में प्रचारित करेगी
भारतीय जनता पार्टी शुरू से अपना उद्देश्य किसी भी प्रकार का राजनीतिक हित से ऊपर देश हित को रखती रही है. भारतीय जनता पार्टी के लोग देश भर में यही प्रचार करेंगे कि वन नेशन-वन इलेक्शन से सीधा देश के लोगों को फायदा होने वाला है. इससे राजनीति करना आसान हो जाएगा.लगातार चुनाव होने से आम लोगों के कार्य प्रभावित होते हैं. लगातार कोई न कोई चुनाव होने के चलते प्रशासन को काम न करने का बहाना मिल जाता है. कहा जाता है कि चुनाव संहिता लगने के चलते ये काम अभी नहीं हो सकता

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