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चीन और रूस इतने सारे संयुक्त सैन्य अभ्यास क्यों कर रहे? सिर्फ NATO ही नहीं, भारत भी टेंशन में

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बीजिंग

चीन और रूस ने हाल ही में प्रशांत क्षेत्र में पनडुब्बी रोधी अभ्यास किया है। इसे दोनों देशों के सैन्य सहयोग को गहरा करने में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है। रूस और चीन की सैन्य एकजुटता का यह नवीनतम प्रदर्शन ऐसे समय में हुआ है जब वैश्विक तनाव बढ़ रहा है, खासकर इंडो-पैसिफिक में। इस क्षेत्र में ये दोनों देश पश्चिमी शक्तियों का विरोध कर रहे हैं। ये अभ्यास रूस और चीन द्वारा पिछले एक साल में किए गए कई संयुक्त अभियानों में से एक है, जो उनके साझा रणनीतिक लक्ष्यों और विश्व मंच पर उनके गठबंधन के बढ़ते महत्व को उजागर करता है।

रूस और चीन का पनडुब्बी रोधी अभ्यास उत्तर-पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में हुआ, जो भू-राजनीतिक रूप से एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। रूस के प्रशांत बेड़े के अनुसार, अभ्यास का उद्देश्य दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने और उन्हें बेअसर करने में दोनों नौसेनाओं के बीच समन्वय में सुधार करना था। पनडुब्बी रोधी अभ्यास आधुनिक नौसैनिक युद्ध में एक महत्वपूर्ण क्षमता है।

शक्तिशाली युद्धपोतों को कर रहे शामिल
इस युद्धाभ्यास में रूस से दो शक्तिशाली विध्वंसक एडमिरल पेंटेलेयेव और एडमिरल ट्रिब्यूट्स ने भाग लिया। इसके साथ ही एक का-27पीएल हेलीकॉप्टर ने भी इस अभ्यास में हिस्सा लिया, जिसने पनडुब्बी का पता लगाने के प्रयासों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। चीन की तरफ से इस अभ्यास में टाइप 055 विध्वंसक वूशी, टाइप 052डी विध्वंसक शिनिंग और टाइप 054ए फ्रिगेट लिन्यी शामिल हुए। इसके साथ ही एक रिफ्यूर शिप और तीन हेलीकॉप्टर भी चीनी फ्लीट का हिस्सा थे। यह युद्धाभ्यास हवा के साथ सतह और पानी के नीचे भी अंजाम दिया गया।

युद्धाभ्यासों से बढ़ा रहे सेनाओं के बीच तालमेल
यह पहली बार नहीं है, जब रूस और चीन ने ऐसे किसी संयुक्त अभ्यास में हिस्सा लिया है। ऐसे युद्धाभ्यास दोनों देशों के बीच बढ़ते सैन्य सहयोग को दर्शाते हैं। ऐसा नहीं है कि दोनों देश सिर्फ दिखावे के लिए ऐसे युद्धाभ्यासों को अंजाम दे रहे हैं। बल्कि, इसका एक और मकसद रूस और चीन के विरोधियों को संदेश भेजना भी है। इन युद्धाभ्यासों से रूस और चीन की सैन्य साझेदारी हर गुजरते साल के साथ मजबूत और अधिक परिष्कृत होती जा रही है। इसके साथ ही, दोनों देशों की सेनाओं में साझा सैन्य अभियानों को लेकर भी एक तालमेल विकसित हो रहा है।

आसमान, जमीन और पानी में कर रहे अभ्यास
रूस और चीन का सबसे प्रमुख अभ्यास सितंबर में जापान सागर और ओखोटस्क सागर में आयोजित बेइबू/इंटरैक्शन-2024 नौसैनिक अभ्यास था। इन अभ्यासों में तोपखाने के हमलों से लेकर हवाई रक्षा युद्धाभ्यास तक कई तरह के युद्ध परिदृश्यों पर जोर दिया गया और इसमें पनडुब्बी रोधी युद्ध कोप्रमुखता से शामिल किया गया चीनी अधिकारियों ने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि ये अभ्यास क्षेत्रीय सुरक्षा खतरों का जवाब देने में दोनों देशों की सैन्य क्षमताओं को बेहतर बनाने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं। लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इनका उद्देश्य चीन और रूस के बीच “रणनीतिक पारस्परिक विश्वास” को मजबूत करना है।

सितंबर में आयोजित रूस के ओशन-2024 अभ्यास ने चीनी नौसेना ने हिस्सा लिया था। इसे रूसी-चीनी सैन्य सहयोग के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पल माना गया। यह अभ्यास रूस द्वारा 30 से अधिक वर्षों में किए गए सबसे बड़े नौसैनिक अभ्यास था, जिसमें 400 से अधिक युद्धपोत, 120 विमान और 90,000 सैन्यकर्मी शामिल थे। इन अभ्यासों में चीन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे रूस के साथ उसकी साझेदारी और मजबूत हुई।

संयुक्त समुद्री गश्त भी कर रहे रूस और चीन
इन संयुक्त अभ्यासों के अलावा, रूस और चीन ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में कई संयुक्त समुद्री गश्त भी की हैं। इनमें से सबसे हालिया गश्त जापान के पास हुई, जो इस क्षेत्र में उनका पांचवां ऐसा ऑपरेशन था। इन गश्तों में सतह के जहाज और पनडुब्बियां दोनों शामिल हैं, जिनका उद्देश्य दोनों देशों की शक्ति को प्रदर्शित करने और अपने समुद्री हितों की रक्षा करने की क्षमता का प्रदर्शन करना है।

जापान और अमेरिका के नजदीक कर रहे गश्त
इन गश्तों ने जापान के साथ तनाव को बढ़ा दिया है, जो अपने आस-पास के जलक्षेत्र में रूस और चीन दोनों की बढ़ती सैन्य उपस्थिति को लेकर चिंतित है। ये गश्त इस साल की शुरुआत में अलास्का के पास के जलक्षेत्र में संयुक्त हवाई गश्त के साथ-साथ अत्यधिक विवादित दक्षिण चीन सागर में नौसैनिक अभ्यास के बाद भी की गई है – जो वैश्विक भू-राजनीति में एक महत्वपूर्ण बिंदु है।

भारत के लिए चिंता की बात क्यों
रूस-चीन सैन्य संबंध सिर्फ नाटो ही नहीं, बल्कि भारत की भी चिंता बढ़ाने वाला है। भारत को डर है कि रूस महत्वपूर्ण सैन्य तकनीक चीन से साझा कर सकता है। चूंकि भारत के 60 प्रतिशत हथियार रूसी मूल के हैं। ऐसे में यह भी आशंका है कि चीन को भारतीय सैन्य तकनीक की जानकारी मिल सकती है। एक डर यह भी है कि चीन के साथ किसी भी संघर्ष के समय रूस खुद को तटस्थ रख सकता है। इसे भारत की एक बड़ी कूटनीतिक हार के तौर पर देखा जाएगा। भारत आज भी सैन्य रूप से रूस पर काफी हद तक निर्भर है।

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