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‘अपनी मर्जी से रह रहीं महिलाएं’, सुप्रीम कोर्ट से जग्गी वासुदेव को बड़ी राहत, ईशा फाउंडेशन के खिलाफ मामला किया खारिज

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नई दिल्ली

सद्गुरु जग्गी वासुदेव के ईशा फाउंडेशन को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने ईशा फाउंडेशन के खिलाफ सभी कार्यवाही रद्द कर दी। एक पिता ने अपनी बंदी प्रत्यक्षीकरण की याचिका में आरोप लगाया गया था कि उसकी दो बेटियों का ब्रेनवॉश करके उन्हें कोयंबटूर स्थित जग्गी वासुदेव के ईशा फाउंडेशन में रहने के लिए मजबूर किया गया था।

सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने फैसला सुनाया कि दोनों महिलाएं वयस्क हैं। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, मुख्य न्यायधीश ने कहा, ‘हमने दोनों महिलाओं से बात की और रिकॉर्ड किया। दोनों ने कहा कि वे वहां अपनी मर्जी से रह रही हैं और हमें बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को बंद करने की जरूरत है ।’ हालांकि, बेंच ने इस बात को साफ कर दिया कि उसका आदेश पुलिस को किसी जांच को आगे बढ़ाने से नहीं रोकेगा।

पिता अपनी बेटियों से मुलाकात कर सकते हैं- सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि अगर आश्रम में किसी तरह की कमी है तो तमिलनाडु सरकार उसे देख सकती है। पिता भी अपनी बेटियों से मिल सकते हैं। साथ ही कोर्ट ने कहा कि वह पुलिस के साथ वहां पर नहीं जा सकते हैं। चीफ जस्टिस ने पिता से भी बात की और बताया कि वह अपने बड़े हो चुके बच्चों की जिंदगी को कंट्रोल नहीं कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि याचिका दायर करने के बजाय उनका भरोसा जीतना चाहिए।

तमिलनाडु पुलिस ने दाखिल की थी स्टेटस रिपोर्ट
ईशा फाउंडेशन की ओर से वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने आज कहा कि तमिलनाडु पुलिस की स्टेटस रिपोर्ट में भी कहा गया है कि महिलाएं अपनी मर्जी से आश्रम में रह रही थीं। पुलिस की तरफ से कोर्ट में बताया गया कि महिलाओं को अवैध तौर पर बंधक बनाने के कोई भी सबूत नहीं मिले हैं।

मुख्य न्यायधीश ने ईशा फाउंडेशन के वकील मुकुल रोहतगी से कहा, ‘जब आश्रम में महिलाएं और नाबालिग बच्चे हों, तो आंतरिक शिकायत समिति (ICC) की जरूरत होती है। इसका उद्देश्य किसी संगठन को बदनाम करना नहीं है, लेकिन कुछ जरूरतें हैं जिनका पालन किया जाना चाहिए। रोहतगी, आपको संस्था पर यह दबाव डालना होगा कि इनका पालन किया जाना चाहिए।’

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