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पाकिस्तान में TTP का आतंक, पेशावर में घुसे सैकड़ों आतंकी, कई इलाकों पर कब्जे का किया दावा

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इस्लामाबाद

पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ नाम से कुख्यात आतंकी समूह टीटीपी ने पेशावर के कई इलाकों पर कब्जे का दावा किया है। पेशावर पाकिस्तान के सबसे अधिक आतंक प्रभावित सूबे खैबर पख्तूनख्वा की राजधानी है। टीटीपी ने दावा किया है कि हम अब पाकिस्तान में मौजूद हैं। हमारे प्रशिक्षण केंद्र, अड्डे और हमारे सभी संसाधन पाकिस्तान में स्थित हैं। हम चाहें तो पाकिस्तान में कहीं भी ऑपरेशन कर सकते हैं और हमने यह क्षमता प्रदर्शित की है।

प्रतिबंधित आतंकी समूह है टीटीपी
टीटीपी कभी पाकिस्तान का सगा हुआ करता था। लेकिन, अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद इसने अपने आतंकी अभियानों को तेज कर दिया। टीटीपी का कहना है कि वह पाकिस्तान में शरिया कानून को लागू करने और इस्लामी हूकुमत को कायम करने के लिए संघर्ष कर रहा है। पाकिस्तान ने अफगान तालिबान की मदद से टीटीपी के साथ संघर्षविराम भी किया, लेकिन वह सफल नहीं हो सका।

टीटीपी की स्थापना क्यों हुई थी
आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में अमेरिका के साथ पाकिस्तान के सहयोग से नाराज टीटीपी की स्थापना 2007 में पाकिस्तानी आतंकवादियों द्वारा आधिकारिक तौर पर की गई थी। टीटीपी के बैनर तले विभिन्न गैरकानूनी समूह पाकिस्तान के खिलाफ मिलकर काम करने और अफगान तालिबान का समर्थन करने के लिए सहमत हुए थे। टीटीपी इस्लामी कानूनों के सख्त प्रवर्तन, सरकारी हिरासत में अपने सदस्यों की रिहाई और खैबर पख्तूनख्वा के कुछ हिस्सों में पाकिस्तानी सैन्य उपस्थिति में कमी चाहता है।

टीटीपी का गढ़ है खैबर पख्तूनख्वा
खैबर पख्तूनख्वा अफगानिस्तान की सीमा से सटा पाकिस्तान का प्रांत है जिसे वह लंबे समय से अपने बेस के रूप में इस्तेमाल करता रहा है। पिछले दो-तीन वर्षों से टीटीपी ने पाकिस्तानी सैनिकों और पुलिस पर हमले बढ़ा दिए हैं। टीटीपी ने बार-बार पुलिस को खैबर पख्तूनख्वा प्रांत की राजधानी पेशावर में अपने लड़ाकों के खिलाफ ऑपरेशन में भाग न लेने की चेतावनी दी है।

TTP और अफ़गान तालिबान के बीच क्या संबंध है?
TTP अफ़गान तालिबान से अलग है, लेकिन उसका एक करीबी सहयोगी है, और अगस्त 2021 में अफ़गानिस्तान पर उस समूह के कब्ज़े ने TTP को मज़बूत किया, जो समूह की विचारधारा को साझा करता है। TTP के लड़ाके पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिम में कबायली इलाकों में छिपते थे और अफ़गानिस्तान में भी उनकी शरणस्थली थी, लेकिन वे ज़्यादातर भगोड़े की तरह रहते थे।

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