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हाई रैंक से UPSC में सिलेक्ट लेकिन… अद्भुत है अंधे सिस्टम से 15 साल तक जंग और जीत की ये कहानी!

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नई दिल्ली

दिल्ली के रोहिणी इलाके में रहने वाले शिवम कुमार श्रीवास्तव की जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। 15 साल की लंबी लड़ाई के बाद उन्हें संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) में नौकरी मिली। यह लड़ाई सिर्फ नौकरी पाने की नहीं थी, बल्कि सिस्टम में अपनी जगह बनाने की थी। शिवम ने 2008 में यूपीएससी परीक्षा पास कर ली थी। उनकी रैंक अच्छी थी, लेकिन फाइनल लिस्ट में उनका नाम नहीं था। कोई कारण नहीं बताया गया, कोई रिजेक्शन लेटर नहीं मिला। बस चुप्पी, एक अनदेखी।

हार नहीं मानी, चुना संघर्ष का रास्ता
शिवम ने हार नहीं मानी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ी। जुलाई 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को उन्हें नौकरी देने का आदेश दिया। तब तक उनके साथ वाले अफसर 15 साल आगे बढ़ चुके थे। कुछ तो जॉइंट सेक्रेटरी बन गए थे। लेकिन 46 साल के शिवम ने नौकरी में कदम रखा ही था। रोहिणी के अपने तीसरे मंजिल वाले घर में शिवम ने कहा, ‘आदेश सात महीने पहले आया, लेकिन मैंने अभी तक जश्न नहीं मनाया। रिश्तेदारों को भी नहीं बताया।’ शिवम अब इंडियन इन्फॉर्मेशन सर्विस (IIS) में हैं।

जब सरकार ही मारने लगे हक
दिव्यांगजन अधिनियम, 1995 के तहत नेत्रहीन उम्मीदवारों को सिविल सेवा में बराबर मौका मिलना चाहिए था। लेकिन कानून का क्या मतलब जब उसे लागू करने वाले ही आंखें बंद कर लें? रिक्त पद खाली रह गए। कानूनी सुरक्षा को नजरअंदाज कर दिया गया। शिवम का हक छीन लिया गया। न्याय में देरी सिर्फ न्याय से इनकार नहीं था, यह उनके करियर को शुरू होने से पहले ही खत्म कर देना था। शिवम कहते हैं, ‘यह लड़ाई सिर्फ मेरी नहीं थी। यह साबित करने की लड़ाई थी कि मेरे जैसे लोग भी इस सिस्टम में जगह पाने के हकदार हैं- भले ही सिस्टम हमें देखने से इनकार कर दे।’ हर छोटी जीत के बाद एक नया झटका लगता था। आईआईएस में जगह मिलने के बाद भी शिवम सतर्क हैं।

जीत तो मिली, लेकिन बहुत कुछ खोकर
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि शिवम को इंडियन रेवेन्यू सर्विस (IRS) या किसी अन्य उपयुक्त सेवा में नियुक्त किया जाए। आखिरकार उन्हें IIS में जगह मिली, लेकिन यह जीत कड़वी थी। सरकारी उदासीनता ने उनके करियर के सुनहरे साल छीन लिए थे, जिसे कोई अदालती फैसला वापस नहीं ला सकता।

शिवम की कानूनी लड़ाई 2009 में शुरू हुई। उन्हें और उनके साथी उम्मीदवार पंकज श्रीवास्तव को पता चला कि UPSC ने 1996 से 2005 तक नेत्रहीन उम्मीदवारों के लिए रिक्त पदों को खाली छोड़ दिया था। उन्होंने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) में चुनौती दी। 2012 में CAT ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया। केंद्र सरकार ने दिल्ली हाई कोर्ट में अपील की। 2013 में हाई कोर्ट ने भी CAT के फैसले को बरकरार रखा। इसके बावजूद केंद्र सरकार ने मामला सुप्रीम कोर्ट में खींच लिया, जहां यह दस साल तक अटका रहा। 2014 से 2024 तक सुनवाई चलती रही, जबकि शिवम का करियर ठप पड़ा रहा।

शिवम बताते हैं, ‘मेरे जैसे तीन और लोग थे। 2008 के नतीजों के बाद हमने पाया कि हमारे UPSC स्कोर विभिन्न सेवाओं के लिए चुने गए लोगों से ज्यादा थे। फिर इंटरव्यू पास करने के बावजूद हमारी नौकरी की कभी सिफारिश नहीं की गई।’ अधिकारियों ने कभी खुलकर नहीं कहा, लेकिन संदेश साफ था- नेत्रहीन अधिकारियों के लिए सरकार में कोई जगह नहीं है।

न्यायपालिका में दी थी सेवा
IIS में नियुक्ति से पहले शिवम ने दो दशक तक न्यायपालिका में काम किया। 2003 में रोहिणी कोर्ट में जूनियर असिस्टेंट क्लर्क के रूप में, फिर सीनियर ज्यूडिशियल असिस्टेंट ऑफिसर के रूप में। वहां भी उन्हें उसी तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ा। दिव्यांग कर्मचारियों के लिए पदोन्नति मुश्किल थी। वह सालों तक एक ही वेतनमान में फंसे रहे, इसलिए नहीं कि उनमें योग्यता की कमी थी, बल्कि इसलिए कि सिस्टम को विश्वास नहीं था कि वह ज्यादा के हकदार हैं।

अभी खत्म नहीं हुई मुसीबत
अब सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में सहायक निदेशक के रूप में अपनी नई नौकरी में छह महीने बिता चुके शिवम, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन (IIMC) में दो साल के इंडक्शन ट्रेनिंग के लिए रोजाना 60 किमी ऑटो रिक्शा से आते-जाते हैं। वे कहते हैं, ‘मुझे कार सहित अन्य सुविधाएं ट्रेनिंग खत्म होने और पोस्टिंग मिलने के बाद ही मिलेंगी।’

17 साल की उम्र में अचानक बदल गई दुनिया
शिवम को बचपन से ही अनदेखा किया जाता रहा। 1978 में बिहार के मोतिहारी में जन्मे शिवम स्कूल में टॉपर थे। 17 साल की उम्र में उनकी दुनिया उजड़ गई। लेबर हेरेडिटरी ऑप्टिक न्यूरोपैथी (LHON) नाम की एक दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी ने उनकी आंखों की रोशनी छीन ली। उनके पिता उन्हें हर संभव विशेषज्ञ के पास ले गए, लेकिन कुछ भी काम नहीं आया। पांच साल तक उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी- योग, ध्यान, वैकल्पिक चिकित्सा सब आजमाया, लेकिन 2001 आते-आते उन्हें हकीकत स्वीकार करनी पड़ी।

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