भोपाल। स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा जारी स्वैच्छिक स्थानांतरण नीति की जटिल शर्तों को लेकर मध्य प्रदेश के सवा चार लाख शिक्षकों में भारी असंतोष व्याप्त है। शिक्षकों का आरोप है कि विभाग ने एक तरफ तो तबादले का अधिकार दिया है, लेकिन दूसरी तरफ 90 प्रतिशत ई-अटेंडेंस और जनगणना ड्यूटी जैसी अव्यावहारिक शर्तें लगाकर करीब 95 प्रतिशत शिक्षकों को आवेदन करने से ही वंचित कर दिया है।
पोर्टल खुलने पर लॉगिन करते ही शिक्षकों को ‘कम उपस्थिति’ के चलते अपात्र होने का मैसेज मिल रहा है। इस नीति के विरोध में शासकीय शिक्षक संगठन और राज्य शिक्षक संघ मैदान में उतर आए हैं। संगठनों ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को ज्ञापन सौंपकर इन शर्तों को तत्काल हटाने की मांग की है और ऐसा न होने पर प्रदेशभर में उग्र आंदोलन की चेतावनी दी है। शासकीय शिक्षक संगठन के कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष उपेंद्र कौशल और राज्य शिक्षक संघ के प्रांताध्यक्ष जगदीश यादव ने कहा कि ई-अटेंडेंस प्रणाली में लगातार तकनीकी खामियां आ रही हैं।
विद्यालय परिसर में मौजूद रहने के बावजूद कई बार शिक्षकों की हाजिरी दर्ज नहीं हो पाती, जिसका खामियाजा अब उन्हें भुगतना पड़ रहा है। इसके अलावा, राष्ट्रीय महत्व के कार्य ‘जनगणना’ में ड्यूटी करने वाले शिक्षकों को अपात्र करना उनके अधिकारों का हनन है। शिक्षक संगठनों ने सुझाव दिया है कि यदि शासन को कार्य प्रभावित होने की आशंका है, तो स्थानांतरण आदेश में यह शर्त जोड़ी जाए कि संबंधित शिक्षक को जनगणना कार्य पूर्ण होने के बाद ही कार्यमुक्त किया जाएगा।
बीमार और ड्यूटी वाले शिक्षक परेशान, तीन कड़े नियमों से अटकी प्रक्रिया
वर्तमान परिस्थितियों में तीन कड़े नियमों—90 प्रतिशत ई-अटेंडेंस की अनिवार्यता, जनगणना ड्यूटी में लगे शिक्षकों पर रोक और 3 वर्ष की न्यूनतम सेवा अवधि की बाध्यता के कारण अधिकांश शिक्षक प्रक्रिया से बाहर हो गए हैं। पीड़ित व्याख्याता विजय मिश्रा ने बताया कि मार्च में हार्ट अटैक के बाद उनके तीन ऑपरेशन हुए हैं। वे बीमारी के चलते घर के पास पदस्थापना चाहते हैं, लेकिन ई-अटेंडेंस कम होने का हवाला देकर उनका आवेदन रिजेक्ट कर दिया गया। इसी तरह, जनगणना कार्य में लगे शिक्षक रामजी तिवारी भी ऑनलाइन प्रक्रिया में ब्लॉक हो गए हैं। शिक्षकों का कहना है कि उत्कृष्ट परीक्षा परिणाम देने के बावजूद इस तरह के नियम उनके साथ सरासर अन्याय हैं, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
