भोपाल। मप्र में कैंसर मरीजों के इलाज का खर्च 50 प्रतिशत तक बढ़ गया है, जिससे प्रति कीमो साइकिल 2 से 3 हजार रुपए का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा। राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) ने कैंसर उपचार में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली दो प्रमुख कीमोथेरेपी दवाओं—कार्बोप्लाटिन और सिस्प्लाटिन के दामों में वृद्धि को मंजूरी दे दी है, जिसकी आधिकारिक अधिसूचना भी जारी हो गई है। कच्चे माल की बढ़ती लागत के चलते दवा कंपनियां घाटे में थीं, जिसके कारण सरकार ने इनकी कीमतों में 10% से 50% तक बढ़ोतरी की है ताकि उत्पादन दोबारा सामान्य हो सके। हालांकि कंपनियों ने प्रोडक्शन शुरू कर दिया है, लेकिन मांग के अनुरूप बाजार में सप्लाई बहाल होने में करीब एक महीने का समय लगेगा।
दामों में बढ़ोतरी के बीच दूसरी बड़ी चिंता दवाओं की भारी किल्लत है। वैश्विक युद्ध और संघर्ष के कारण सप्लाई चेन बाधित होने से भोपाल सहित प्रदेश के कैंसर अस्पतालों में प्लैटिनम-बेस्ड कीमो की दवाएं पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं। गांधी मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्रोफेसर डॉ. ओपी सिंह और ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. टी.पी. साहू के अनुसार, देश के करीब 70 प्रतिशत कीमोथेरेपी रेजिमेंस में सिस्प्लाटिन का उपयोग होता है। यह दवा फेफड़े, ओवरी, स्तन, मुंह, सर्वाइकल और गॉलब्लैडर समेत कई प्रमुख कैंसर के इलाज की ‘बैकबोन’ (मुख्य आधार) मानी जाती है।
डॉक्टरों के मुताबिक, सिस्प्लाटिन जैसी दवा जहां कुछ हजार रुपए में इलाज पूरा कर देती है, वहीं इसका विकल्प ‘इम्यूनोथेरेपी’ लाखों रुपए का होता है, जो आम मरीजों की पहुंच से बाहर है। दवाओं की इस तीव्र कमी के कारण डॉक्टरों को अब मरीजों के इलाज के स्थापित स्टैंडर्ड तरीकों में बदलाव करने पर मजबूर होना पड़ रहा है।
