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EWS रिजर्वेशन: सुप्रीम कोर्ट के फैसले से क्या टूट गई है 50 फीसदी आरक्षण की सीमा?

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नई दिल्ली,

आर्थिक रूप से सामान्य वर्ग के कमजोर तबके को 10 फीसदी आरक्षण दिए जाने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने भी सही ठहरा दिया है. चीफ जस्टिस यूयू ललित की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच में तीन जजों ने माना कि ईडब्ल्यूएस आरक्षण पूरी तरह से संवैधानिक है जबकि दो जजों ने इसके खिलाफ में अपना फैसला दिया. इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों में दाखिले और सरकारी नौकरियों में भर्ती में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों के लिए 10 फीसदी आरक्षण पर मुहर लगा दी है. कोर्ट के इस फैसले के बाद आरक्षण पर बहस के अब नए मोर्चे खुल गए हैं. जहां फैसले के पॉजिटिव और निगेटिव असर पर बात हो रही है, वहीं कुछ सवाल भी उठाए जा रहे हैं जिनका सामना भविष्य में करना पड़ सकता है.

10 सवर्ण आरक्षण का दायरा क्या बढ़ सकता है
दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय यानी जेएनयू में राजनीतिक अध्ययन केंद्र के एसोसिएट प्रोफेसर हरीश वानखेड़े कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने ईडब्ल्यूएस को उस दस फीसदी आरक्षण को सही ठहराया है, जो साल 2019 से पहले संविधान के मूल ढांचे में था ही नहीं. इस फैसले के बाद गरीब सवर्णों को अभी 10 फीसदी आरक्षण पर मुहर लगी है, लेकिन भविष्य में इस 10 फीसदी के दायरे को सरकारें वोटों की राजनीतिक के चलते बढ़ा भी सकती हैं.

आर्थिक आधार पर आरक्षण का खुला रास्ता
हरीश वानखेड़े कहते हैं कि आरक्षण गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने आज के फैसले से देश में आर्थिक आरक्षण का रास्ता खोल दिया है. अभी तक, आरक्षण सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग को दिया जाता था, लेकिन अब आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को भी आरक्षण मिलेगा. भविष्य में आर्थिक आधार पर ही आरक्षण लागू करने की मांग जोर पकड़ सकती है, लंबे समय से कुछ लोग ये मांग कर भी रहे थे.

प्रोफेसर वानखेडे ने कहा कि जस्टिस बेला एम त्रिवेदी ने अपना फैसला पढ़ते समय कहा है कि आजादी के 75 साल के बाद हमें समाज के व्यापक हित में आरक्षण की व्यवस्था पर फिर से विचार करने की जरूरत है. यह बयान ही बता रहा है कि आरक्षण पर किस तरह से संकट गहरा रहा है.

वानखेड़े आज के फैसले का एक और पहलू गिनाते हैं. वो कहते हैं कि ईडब्ल्यूएस पर सुप्रीम कोर्ट से फैसले से मुसलमानों और ईसाई समुदाय को भी आरक्षण का लाभ मिल सकेगा. कोर्ट अभी तक मुसमलानों के आरक्षण को इसीलिए खारिज करता रहा है क्योंकि धार्मिक आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता. आंध्र प्रदेश या फिर दूसरे राज्यों में पांच या सात फीसदी आरक्षण को इसी आधार पर रिजेक्ट कर दिया गया, लेकिन अब आर्थिक आधार पर आरक्षण इन वर्गों को भी मिल सकता है. मुस्लिमों के आर्थिक रूप से पिछड़े होने की कई रिपोर्टें मौजूद हैं, जो उनके आरक्षण का आधार बन सकती है.

50 फीसदी आरक्षण की सीमा टूटी?
दिल्ली विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर लक्ष्मण यादव कहते हैं कि संविधान आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की अनुमति नहीं देता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने ईडब्ल्यूएस कोटे को सही ठहराया है, जिसके बाद भविष्य में आरक्षण का प्रावधान आर्थिक आधार पर ही तय होगा. ईडब्ल्यूएस पर आज के फैसले से इंदिरा साहनी के 50 फीसदी आरक्षण का दायरा भी खत्म हो गया है, क्योंकि आरक्षण का दायरा 60 फीसदी हो गया है. सुप्रीम कोर्ट भले ही कहे कि EWS को बाकी बचे 50 फीसदी में से 10 फीसदी आरक्षण दिया गया, लेकिन सामान्य वर्ग का 50 निर्धारित कोटा सभी जातियों को लिए ओपेन था.

बता दें कि इंदिरा साहनी जजमेंट में आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 फीसदी तय कर दी थी. हाल फिलहाल ईडब्ल्यूएस को चुनौती देने वाली याचिकाओं में इसका तर्क भी दिया गया था कि इस कोटे से 50 फीसदी की सीमा का उल्लंघन हो रहा है. केंद्र सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए तत्कालीन अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने सुनवाई के दौरान कहा था कि आरक्षण के 50 फीसदी बैरियर को सरकार ने नहीं तोड़ा. उन्होंने कहा था कि 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने ही फैसला दिया था कि 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए ताकि बाकी 50 फीसदी जगह सामान्य वर्ग के लोगों के लिए बची रहे. यह आरक्षण 50 फीसदी में आने वाले सामान्य वर्ग के लोगों के लिए ही है. ऐसे में यह बाकी के 50 फीसदी वाले ब्लॉक को डिस्टर्ब नहीं करता है.

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दिनेश माहेश्वरी ने कहा कि आरक्षण 50 फीसदी तय सीमा के आधार पर भी ईडब्ल्यूएस आरक्षण मूल ढांचे का उल्लंघन नहीं है, क्योंकि 50 फीसदी आरक्षण की सीमा अपरिवर्तनशील नहीं है. वहीं, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस रविंद्र भट्ट ने कहा कि आर्थिक आधार पर आरक्षण अवैध नहीं है, लेकिन इसमें से एससी-एसटी और ओबीसी को बाहर किया जाना असंवैधानिक है. यह 50 फीसदी आरक्षण के बैरियर को तोड़ता है.

EWS में कौन आएगा और कौन नहीं
केंद्र की मोदी सरकार ने जनवरी 2019 में इकॉनमिकली वीकर सेक्शन (ईडब्ल्यूएस) के तहत आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य जाति के लोगों को आरक्षण देने का फैसला लिया था. इसके तहत सरकारी नौकरी से लेकर शिक्षण संस्थाओं में 10 फीसदी आरक्षण देने प्रावधान है. इसमें केवल जनरल कैटेगरी (सवर्ण जाति) के गरीब लोगों को आरक्षण दिया जाएगा. ईडब्ल्यूएस आरक्षण से एसईबीसी (सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा वर्ग), ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग), एससी (अनुसूचित जाति) और एसटी (अनुसूचित जनजाति) वर्ग को बाहर रखा गया है.

ईडब्ल्यूएस को आरक्षण दिए जाने के फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी. अगस्त 2020 को तत्कालीन चीफ जस्टिस एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने मामला संविधान पीठ को सौंपा था, लेकिन आरक्षण पर रोक नहीं लगाई थी. चीफ यूयू ललित की अध्यक्षता वाली पांच जजो की बेंच ने इस केस की सुनवाई की थी और 27 सितंबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था.

सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच में से 3 जजों ने ईडब्ल्यूएस आरक्षण को संवैधानिक ठहराया है. जस्टिस दिनेश माहेश्वरी, जस्टिस बेला त्रिवेदी और जस्टिस जेबी पारदीवाला ने पक्ष में फैसला सुनाया और संविधान के 103वें संशोधन अधिनियम 2019 को सही माना है. वहीं, चीफ जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस रवींद्र भट ने ईडब्ल्यूएस आरक्षण के खिलाफ अपना फैसला सुनाया है. और इसे खारिज कर दिया है.

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