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भारत गलती सुधार रहा, अमेरिकी चुनाव से पहले बड़ा दांव… मोदी-जिनपिंग की मुलाकात से गदगद हुआ चीन का ग्लोबल टाइम्स

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बीजिंग

रूस के कजान में हुए 16वें BRICS शिखर सम्मेलन से इतर भारतीय पीएम नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग मिले। चीनी विश्लेषकों का कहना है कि इस मीटिंग का रणनीतिक महत्व है। क्योंकि चीन-भारत संबंधों की बहाली दोनों देशों के हितों को तो पूरा करती है। साथ ही बहु-ध्रुवीय विश्व व्यवस्था को भी बनाती है। रूस के कजान में पीएम मोदी के साथ अपनी मुलाकात के दौरान शी ने एक दूसरे के विकास की आकांक्षाओं को पूरा करने में मदद का आग्रह किया।

शिन्हुआ की रिपोर्ट के मुताबिक शी ने दोनों पक्षों को संचार और सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया। साथ ही कहा कि मतभेदों और असहमतियों को ठीक से मैनेज करना चाहिए। 2019 के बाद यह दोनों नेताओं के बीच पहली द्विपक्षीय मीटिंग है। ग्लोबल टाइम्स के मुताबिक फुडन यूनिवर्सिटी में दक्षिण एशियाई अध्ययन केंद्र के उप निदेशक लिन मिनवांग ने बुधवार को बताया कि बैठक से पता चलता है कि चीन-भारत अब संबंध सुधार की राह पर हैं।

सीमा विवाद का अस्थायी समाधान
दोनों देशों के बीच संबंधों में खटास का प्रमुख कारण लंबे समय से चला आ रहा भारत-चीन सीमा विवाद है। खासकर 2020 में गलवान घाटी में हुई झड़प के बाद। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने कहा है कि दोनों पक्ष राजनयिक और सैन्य चैनलों के जरिए अस्थायी समाधान पर पहुंच गए हैं। इससे गहन सहयोग का रास्ता साफ हुआ है।

BRICS से सुलझेंगे मुद्दे?
शी मोदी की मीटिंग व्यापक भू-राजनीतिक बदलावों को दिखाती है। चाइना फॉरेन अफेयर्स यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ली हैडॉन्ग ने कहा, ‘यह मीटिंग दिखाती है कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं की ओर से बना यह अंतरराष्ट्रीय संगठन प्रमुख देशों के लिए कूटनीति के साथ संवेदनशील मुद्दों पर एक दूसरे के साथ समन्वय करने का एक महत्वपूर्ण मंच और चैनल है। इसके जरिए संबंध ठीक हो रहे हैं और आम सहमति बन रही है।’

उन्होंने आगे कहा कि दुनिया बहु-ध्रुवीकरण के दौर में प्रवेश कर रही है। चीन और भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाएं इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण खिलाड़ी हैं। इसलिए अगर वे मतभेदों को अलग रखकर आपसी विश्वास ला सकते हैं तो यह अंतर्राष्ट्रीय सुधार के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

भारत गलती सुधार रहा?
लिन मिनवांग ने दावा किया कि भारत ने पिछले चार वर्षों में अमेरिका के समर्थन पाने की कोशिश में चीन से अलग होकर गलती की। उन्होंने कहा कि भारतीय नीति निर्माताओं को अब यह समझ आ गया है और वह इस गलती को सुधार रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘भारत की नीति जिसका उद्देश चीन से अलग होना है, उसे अमेरिका के नेतृत्व वाले पश्चिमी देशों से ‘मेड इन इंडिया’ और देश के आधुनिकीकरण और औद्योगीकरण में उम्मीद के मुताबिक समर्थन नहीं मिला। इससे साबित होता है कि भारत चीन से अलग होकर कोई फायदा नहीं पा सकता। यह भारत के विकास के लिए ही मुश्किल है।’

अमेरिका को संदेश?
ग्लोबल टाइम्स ने लिखा कि यह सिर्फ भारत के लिए आर्थिक कारण है। उसका कहना है कि अमेरिका बहुत ही अनिश्चित और अविश्वसनीय है। उसके मुताबिक अमेरिकी विदेश नीति में नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के बाद यू-टर्न देखने को मिल सकता है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक भारत को पहले कदम उठाकर जोखिमों को कम करना होगा। चीनी एक्सपर्ट्स का कहना है कि कई मुद्दों पर अमेरिका और उसके सहयोगियों ने भारत को वह समर्थन नहीं दिया। जिस कारण विश्वास कम हुआ है। कनाडा के साथ तनाव पर अमेरिका ने भारत का पक्ष नहीं लिया।

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