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Thursday, January 22, 2026
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यूपी में सियासत की ‘PG’ बनी करणी सेना? 360 डिग्री ‘पलटी प्लान’ के बावजूद अखिलेश गदगद, टेंशन में बीजेपी!

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लखनऊ

औरंगजेब विवाद का सबसे बड़ा असर उत्तर प्रदेश की राजनीति में देखा जा रहा है। समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सांसद रामजीलाल सुमन के राणा सांगा पर दिए गए बयान के बाद मामला और गरमा गया है। राजपूतों की करणी सेना ने रामजीलाल सुमन के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है।आगरा में उनके आवास पर हमला किया गया, इसके बाद खुलेआम शक्ति प्रदर्शन हुआ। अब अलीगढ़ में सांसद के काफिले को काले झंडे दिखाए गए और टायर फेंके गए। इस घटना पर अखिलेश यादव भड़के हुए हैं। उन्होंने करणी सेना को ‘योगी की सेना’ तक करार दे दिया है। अखिलेश सांसद की सुरक्षा को लेकर यूपी सरकार पर हमलावर हैं। दूसरी तरफ लखनऊ के सत्ता के गलियारे में इस पूरे घटनाक्रम के तमाम सियासी मायने तलाशे जा रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषक इसे अखिलेश यादव की पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) पॉलिटिक्स में अहम मोड़ मान रहे हैं, वहीं भारतीय जनता पार्टी के लिए नई मुश्किल के तौर पर देख रहे हैं। पूरी कहानी के केंद्र में वोटबैंक पॉलिटिक्स है। दरअसल यूपी में राजपूत वोट बैंक करीब 5 से 6 प्रतिशत माना जाता है। लेकिन ये अपनी आबादी से कहीं ज्यादा प्रभाव रखता है। यूपी में कई विधानसभा और लोकसभा सीटें ऐसी हैं, जहां राजपूत वोट बैंक भले ही संख्या में ज्यादा न हो लेकिन जीत हार का फैसला करने का माद्दा रखता है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को जो झटका लगा था, उसमें राजपूत वोटरों की नाराजगी को ही अहम माना गया था। एक ‘प्रेशर ग्रुप’ की तरह करणी सेना ने राजपूतों को यूपी भर में एकजुट करने में विशेष भूमिका निभाई थी। उसकी छोटी-छोटी बैठकों ने भाजपा के दिग्गजों को पस्त किया। चुनाव में इसका सीधा फायदा अखिलेश यादव को मिला। कई जगह राजपूतों ने इंडिया गठबंधन के प्रत्याशी को समर्थन दिया, जिसके कारण सपा 37 सीटें जीतकर यूपी से सबसे बड़ा दल बनकर उभरी।

हालांकि इसके बाद यूपी में सियासी हवा बदली और राजपूत वोट बैंक भाजपा की तरफ वापस मुड़ा। यूपी उपचुनाव में इसका असर देखने को मिला। भाजपा ने अयोध्या के मिल्कीपुर के साथ कुल 10 में से 8 सीटें अपने नाम कीं। अखिलेश सिर्फ कानपुर की सीसामऊ और मैनपुरी की करहल सीट ही बचा पाए। लेकिन अब करणी सेना के नए रुख ने चीजें फिर से बीजेपी के लिए मुश्किलें खड़ी करनी शुरू कर दी हैं। दरअसल सपा के राज्यसभा सांसद रामजी लाल सुमन के खिलाफ करणी सेना हमलावर है। इसने अखिलेश यादव को बीजेपी पर दोतरफा हमले का मौका दे दिया है। एक तरफ अखिलेश यादव इस हमले को सामाजिक न्याय के साथ जोड़ रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ योगी सरकार को कानून व्यवस्था पर भी लपेट रहे हैं।

दरअसल उत्तर प्रदेश में दलित वोट बैंक प्रदेश में करीब 21 प्रतिशत माना जाता है। 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद जब बसपा सुप्रीमो मायावती ने सपा के साथ गठबंधन तोड़ा तब से अब तक अखिलेश यादव ने सबसे ज्यादा बसपा को ही डेंट किया है। मुलायम के जमाने में जो समाजवादी पार्टी यादवों और मुस्लिमों की पार्टी कही जाती है, अखिलेश ने उसमें बड़े दलित वोट बैंक को भी जोड़ने की पीडीए पॉलिटिक्स शुरू की है। मायावती के करीबी माने जाने वाले तमाम नेता आज अखिलेश के साथ खड़े हैं। यही नहीं बहुजन समाज की विचारधारा से जुड़े कई स्वयंसेवकों को भी अखिलेश यादव ने अपने यहां जगह दी है। भाजपा ने भी दलितों को जोड़ने की तमाम कोशिशें की हैं। 2024 से पहले तक माना जाता था कि बसपा का दलित वोट बैंक खिसककर भाजपा की तरफ गया लेकिन 2024 में इंडिया गठबंधन की बड़ी जीत ने ये बता दिया कि दलित वोटबैंक में अब अखिलेश यादव की भी हिस्सेदारी है।

ताजा विवाद ने भाजपा को पशोपेश में डाल दिया है। दरअसल पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि हमें राजपूतों का साथ तो चाहिए लेकिन दलित वोटबैंक की कीमत पर नहीं। फिलहाल पार्टी चीजों पर नजर बनाए हुए हैं।

करणी सेना क्या यूपी में इतनी मजबूत हो गई है?
पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं। राजस्थान के जयपुर में आज से 19 साल पहले 2006 में कुछ राजपूत समुदाय के लोगों ने करणी सेना नाम के संगठन का गठन किया। संगठन का नाम करणी माता के नाम पर रख गया। इस संगठन का उद्देश्य वैसे तो सरकारी नौकरियों और शिक्षा में राजपूतों के लिए जाति आधारित आरक्षण की मांग करना था। लेकिन गठन होने के काफी समय तक ये अपनी पहचान नहीं बना पा रहे थे। समय के साथ इसके कई धड़े अलग हुए।

आखिरकार गठन के करीब 12 साल बाद 2018 में संजय लीला भंसाली की पद्मावत फिल्म का विरोध प्रदर्शन से करणी सेना ने देश भर में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। संजय लीला भंसाली पर हमला हुआ, सिनेमाघरों में हिंसक प्रदर्शन हुए। फिल्म के सेट पर तोड़फोड़ जैसी घटनाएं सामने आईं। इसके बाद करणी सेना के इन संगठनों ने राजपूत अस्मिता से जोड़ते हुए कई और फिल्मों का विरोध किया। संगठन ने दावा किया कि बॉलीवुड ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करता है, इससे राजपूत समाज की छवि प्रभवित होती है।

वैसे तो देश में पहले भी राजपूत समाज के तमाम संगठन मौजूद थे लेकिन करणी सेना के आक्रामक प्रदर्शनों ने युवाओं का खासा लुभाया। देखते ही देखते इस संगठन ने राजस्थान से उठकर मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों के क्षत्रिय बाहुल्य इलाकों में अपने पैर पसार लिए।हालांकि ये संगठन खुद को गैर राजनीतिक ही बताता है लेकिन वोट बैंक के चलते तमाम पार्टियां इसके पाले में खड़ी ही नजर आती हैं। समय के साथ संगठन के धीरे-धीरे शिक्षा और रोजगार की बात दबती चली गई और ये संगठन किसी प्रेशर ग्रुप की तरह राजनीति में इस्तेमाल किया जाने लगा। फिलहाल उत्तर प्रदेश में इसने अपनी धमक का एहसास कराना शुरू कर दिया है।

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