4 C
London
Tuesday, May 12, 2026
Homeराष्ट्रीयहमेशा के लिए नहीं हो सकता आरक्षण, समय सीमा तय करने की...

हमेशा के लिए नहीं हो सकता आरक्षण, समय सीमा तय करने की जरूरत : सुप्रीम कोर्ट

Published on

नई दिल्ली

सामान्य वर्ग के गरीबों को आर्थिक आधार पर आरक्षण देने के सरकार के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने मुहर लगा दी है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने एक नसीहत भी दी है। जी हां, देश की सबसे बड़ी अदालत ने सोमवार को जोर देकर कहा कि कोटा सिस्टम के लिए एक समयसीमा तय करने की जरूरत है और ये हमेशा के लिए नहीं रह सकता। आरक्षण का मकसद सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना है, लेकिन यह अनिश्चितकाल तक जारी नहीं रहना चाहिए जिससे यह निहित स्वार्थ न बन सके। सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में दाखिले और सरकारी नौकरियों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान करने वाले 103वें संविधान संशोधन की वैधता को 2 के मुकाबले 3 मतों के बहुमत से बरकरार रखा है।

EWS आरक्षण के दायरे में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के गरीब नहीं आएंगे। शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि यह भेदभाव वाला नहीं है और संविधान के बुनियादी ढांचे का उल्लंघन भी नहीं करता है। जस्टिस दिनेश माहेश्वरी, जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और जस्टिस जे बी पारदीवाला ने कानून को बरकरार रखा, जबकि चीफ जस्टिस यूयू ललित ने अपने कार्यकाल के अंतिम दिन इस पीठ की अध्यक्षता करते हुए जस्टिस एस रवींद्र भट के साथ खिलाफ में रहे।

जस्टिस त्रिवेदी और जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि कुछ समय के बाद ये तरजीही व्यवस्था हटाई जानी चाहिए। जस्टिस त्रिवेदी ने कहा, ‘संविधान निर्माताओं ने क्या सोचा था, 1985 में संविधान पीठ ने क्या प्रस्ताव दिया था और संविधान के लागू होने के 50 साल के बाद क्या हासिल करना चाहते थे, वह था कि आरक्षण नीति की एक अवधि होनी चाहिए जिसे आज आजादी मिलने के 75 साल बाद भी हासिल नहीं किया जा सका है।’ उन्होंने आगे कहा कि यह नहीं कहा जा सकता है कि भारत में प्राचीन समय से चली आ रही जातिगत व्यवस्था देश में आरक्षण प्रणाली के लिए जिम्मेदार है। इसे एससी, एसटी और ओबीसी समुदाय के लोगों के साथ हुए अन्याय को सुधारने और अगड़े वर्ग से जुड़े लोगों के साथ प्रतिस्पर्धा के लिए समान अवसर मुहैया कराने के लिए लाया गया था।

जस्टिस त्रिवेदी ने कहा कि लेकिन हमारी आजादी के 75 साल होने के बाद अब हमें समाज के व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए आरक्षण प्रणाली पर फिर से विचार करने की जरूरत है।जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि आरक्षण का मतलब सामाजिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित करना है और निहित स्वार्थ बनने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। शिक्षा और विकास के लाभ का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि भारी संख्या में बैकवर्ड क्लास के लोग शिक्षा और रोजगार पा रहे हैं। ऐसे में जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि ऐसे लोगों को बैकवर्ड श्रेणी से हटाया जाना चाहिए जिससे क्लास के उन लोगों पर ध्यान दिया जा सके जिन्हें वास्तव में मदद की जरूरत है।

Latest articles

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व: प्रधानमंत्री के नेतृत्व में देश की सनातन संस्कृति को मिला नया गौरव : मुख्यमंत्री साय

रायपुर। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय सोमवार को राजधानी रायपुर के महादेव घाट स्थित हाटकेश्वर...

आध्यात्मिक विरासत और राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रतीक है सोमनाथ मंदिर: मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा

जयपुर। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा सोमवार को गुजरात के सोमनाथ मंदिर में आयोजित 'सोमनाथ अमृत...

बरनाला पहुंचे सीएम भगवंत मान: बोले- अब कोई नहीं बचा पाएगा बेअदबी के दोषियों को, हाईकोर्ट ने भी कानून पर लगाई मुहर

बरनाला। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान शुक्रवार को 'शुकराना यात्रा' के दौरान बरनाला पहुंचे।...

More like this

पश्चिम एशिया संकट का असर: परियोजनाओं की समय-सीमा प्रभावित, वित्त मंत्रालय ने ‘फोर्स मेज्योर’ के तहत दी राहत

नई दिल्ली/भोपाल। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति श्रृंखला...

शुभेंदु अधिकारी पीए हत्याकांड में बंगाल पुलिस ने बलिया के राज सिंह को किया गिरफ्तार, चुनाव लड़ चुका है आरोपी

बलिया। बलिया का नाम पश्चिम बंगाल के चर्चित शुभेंदु अधिकारी के निजी सहायक (पीए)...

PM मोदी बोले- पेट्रोल-डीजल का कम करें उपयोग, भारत में तेल के कुएं नहीं

आज वर्क फ्रॉम होम की जरूरत, एक साल तक सोना न खरीदें बेंगलुरु/हैदराबाद। पीएम नरेंद्र...