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अजब है टैक्स की उलटबांसी, अमीरों के ब्रेड पर जीरो टैक्स, गरीबों की माचिस पर 12% GST

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आपने कभी सोचा है कि पिछड़े या दूर-दराज के इलाके के गांवों के लिए माचिस कितनी जरूरी चीज है? यदि आपको इसका अंदाजा लेना हो तो कभी बिहार के किसी पिछड़े गांव में एक रात गुजारिए। गांव वालों के लिए आज भी माचिस बेहद जरूरी चीज है। आपको जान कर बेहद आश्चर्य होगा कि माचिस पर 12 फीसदी की दर से जीएसटी वसूली जाती है। जीएसटी की यही दर मक्खन या बटर पर भी वसूली जाती है, जिसे विलासिता की वस्तु समझा जाता है। लेकिन ब्रेड पर जीरो जीएसटी है।

टैक्स की अलग उलटबांसी
किताबों में पढ़ते हैं कि अमीरों से ज्यादा टैक्स लिया जाता है और गरीबों से नहीं लिया जाता है। लेकिन अप्रत्यक्ष कर या जीएसटी में ऐसा नहीं होता। जीएसटी सभी पर एक समान दर से लगाया जाता है। इसलिए गरीब लोग यह टैक्स ज्यादा देते है। क्योंकि उनकी जरूरत ज्यादा है। वे ज्यादा सामान खरीदते हैं तो टैक्स भी ज्यादा देते हैं।

गांव में ब्रेड और माचिस में क्या जरूरी
दो वस्तु ब्रेड या पावरोटी और दियासलाई या माचिस के उदाहरण से समझिए। शहरी लोग, जहां बिजली एक मिनट के लिए भी नहीं जाती, वह माचिस की महत्ता से अपरिचित होंगे। लेकिन गांवों के लिए माचिस अत्यावश्यक चीज है। क्योंकि शाम ढलते ही लालटेन या ढिबरी जलानी है। इसमें माचिस का उपयोग होगा। गांवों बिजली तो चली गई है, लेकिन इसकी निर्बाध आपूर्ति तो है नहीं। इसलिए लालटेन और ढिबरी गांव के लिए आज भी जरूरी चीज है। अब आते हैं पावरोटी पर। तो यह जान लें कि अभी भी गांव के लोग रोज ब्रेड नहीं खाते। कभी-कभार खा लिए शौक से, जैसे कोई मिठाई खा रहे हों। हां, शहराती लोगों के लिए यह रोज की जरूरी वस्तु है।

गांवों में माचिस का कई उपयोग
भारत के पिछड़े गांवों के लिए माचिस आज भी अति आवश्यक है। सुबह उठते ही चाय की तलब लगेगी, तो चूल्हा जलाना होगा। चूल्हा जलाने के लिए माचिस चाहिए। बीड़ी की तलब लगी, तो बीड़ी निकाली। बीड़ी जलाने के लिए माचिस चाहिए। खेत की मेंड पर सुस्ता रहे हैं किसान। उन्हें बीड़ी पीने का मन करता है। वहां भी माचिस जरूरी है। शाम होते ही लालटेन जलाना है। इसके लिए माचिस चाहिए।

मक्खन और माचिस पर एक समान जीएसटी
आपने शायद इस बात पर कभी ध्यान नहीं दिया होगा कि माचिस पर कितना जीएसटी है। इस पर 12 फीसदी की दर से जीएसटी वसूली जाती है। इतनी ही जीएसटी मक्खन या बटर पर भी वसूली जाती है। यही नहीं, पैकेज्ड घी पर भी 12 फीसदी की ही दर से जीएसटी चुकाना होता है। मक्खन तो घोषित तौर पर लग्जरी वस्तु है।

ब्रेड पर जीरो जीएसटी
गांवों में पावरोटी सब नहीं खा सकते। क्योंकि गरीबों के लिए ब्रेड आज भी लग्जरी चीज है। एक तो दूर-दराज के गांवों या पिछड़े गांवों में आज भी ब्रेड की उपलब्धता दूर की कौड़ी है। यह शहराती लोगों के डेली नीड्स में शामिल है, इसलिए इस पर जीरो जीएसटी है। लेकिन माचिस आपको किसी भी गांव के दुकान में मिल जाएगी। क्योंकि यह गांव के लिए सबसे जरूरी चीजों में शामिल है।

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