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‘आधा हिमालय खा चुके हम, आधा सड़क निर्माण खा जाएगा…’, अवैज्ञानिक विकास पर भड़के एक्सपर्ट

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नैनीताल,

कुमाऊं विश्वविद्यालय के सेंटर ऑफ एडवांस्ड स्टडी इन जियोलॉजी के प्रो. बहादुर सिंह कोटलिया ने कुछ सवाल खड़े किए हैं? क्योंकि वो जोशीमठ की स्थिति से परेशान हैं. कहते हैं ऐसी और भी जगहें हैं जो धंस सकती हैं. आधा हिमालय तो हम खा चुके हैं, आधा बचा हुआ यह सड़क चौड़ीकरण खा जाएगा. पहले उनके सवाल जान लेते हैं?

1. क्या वैज्ञानिक तरीके से सड़कों के चौड़ीकरण का कार्य हो रहा है?
2. चारधाम लोग हजारों वर्षों से पैदल जाते थे. जिसे आस्था है वो पैदल जाएगा, फिर सड़कों के चौड़ीकरण की जरुरत क्यों है?
3. पहाड़ पर हो रहे अंधाधुंध निर्माण से हिमालय की स्थिति खराब हो रही है, उसे क्यों नहीं रोकती सरकार?
4. सड़कों के चौड़ीकरण के लिए कोई परफेक्ट जियोलॉजिकल रिपोर्ट बनाई गई है, सिर्फ कमेटी बनाने से कुछ नहीं होता?
5. पहाड़ों की बुनियाद पर स्टडी किए बगैर ऊपर से खुदाई क्यों शुरू कर दी जा रही है?

इन सवालों के साथ प्रो. कोटलिया पूछते हैं कि चार धाम यात्रा के लिए जो सड़क चौड़ीकरण हो रहा है, क्या वह वैज्ञानिक तरीके से हो रहा है? क्या उत्तराखंड के विकास को लेकर किसी तरह की साइंटिफिक स्टडी की जाती है. आप सड़कों को चौड़ा करने के लिए किसी चट्टान को काटोगे. वह फिर भरभरा कर गिर पड़ेगी. यह बहुत बड़ा सवाल है कि किसी भी धाम या मंदिर को जाने के लिए लोग हजारों सालों से पैदल ही जाते थे, जिसकी आस्था होती है वह पैदल ही जाता है. तो हर मंदिर तक सड़क ले जाने की जरूरत क्या है?

प्रो. कोटलिया कहते हैं कि अगर आपको सड़क लेकर ही जानी है तो सड़कों का चौड़ीकरण वैज्ञानिक तरीके से किया जाना चाहिए. क्या आज तक किसी सड़क के चौड़ीकरण के लिए कोई एक परफेक्ट जियोलॉजिकल रिपोर्ट बनाई गई है? सिर्फ समिति बनाने से कुछ नहीं होता. मशीनों का क्या है वह तो ऊपर से खोदना शुरू कर देती है. पर उस चट्टान की बुनियाद का तो उन्हें पता भी नहीं होता. बुनियाद मजबूत नहीं होगी तो चट्टान या पहाड़ भरभरा कर नीचे गिरेगा.

प्रोफेसर बहादुर सिंह कोटलिया ने बताया कि उत्तराखंड की अधिकांश सड़कें रिवर टेरेस में बैठी हुई है. रिवर टेरेस यानी अभी जहां नदी है, उससे पहले वह काफी ऊंचाई पर बह रही थी. अब वहां पर धंसने लायक, खिसकने लायक मिट्टी है, जिसपर निर्माण हो रहा है. जो सड़कों को चौड़ा किया जा रहा है वह सब रिवर टेरेस की है. मतलब मलबे पर बैठी है. यह मलबा तो गिरना ही है. मुझे नहीं लगता कि उत्तराखंड में सड़कों के चौड़ीकरण का काम कभी सफल हो पाएगा. आप सड़कों को चौड़ा करेंगे. बरसात में वह फिर से गिर जाएगा.

उत्तरकाशी, नैनीताल, चंपावत जिलों पर भी खतरा
प्रोफेसर कोटलिया बताते हैं कि ऐसे तो पूरा उत्तराखंड ही संवेदनशील है, पर जब भूस्खलन की बात होती है तो कुछ शहर है जो भूस्खलन की दृष्टि से अति संवेदनशील है जैसे उत्तरकाशी. उत्तरकाशी ग्लेशियल मलबे पर बसा है. साथ ही चंपावत जिले का सुखी ढंग से लेकर टनकपुर तक का क्षेत्र बहुत ही संवेदनशील है क्योंकि उसमें शिवालिक श्रेणी की चट्टाने हैं. वह भी भरभरा कर गिरती है. जोशीमठ में भू धंसाव की घटना के बाद नैनीताल में भी प्राकृतिक हलचल के खतरे के डर से लोग सहमे हुए हैं. जोशीमठ की तरह नैनीताल भी खतरे में है.

नैनीताल की बुनियाद 1972 से धंस रही है
प्रोफेसर कोटलिया कहते हैं कि नैनीताल में चट्टानों की समस्या तो नहीं है. यहां पर लाइन स्टोन हैं. लाइमस्टोन बहुत सख्त होती है मगर नैनीताल की सबसे बड़ी समस्या है नैनीताल की बुनियाद बलिया नाला. जो सालों से धंसता जा रहा है. आज तक उसका कोई वैज्ञानिक उपचार नहीं किया गया. बलिया नाला क्षेत्र में 1972 से लगातार भूस्खलन हो रहा है. उसके बावजूद भी सरकार क्षेत्र में हो भूस्खलन को रोकने में असफल रही है, अब नैनीताल के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है.

कितने घर समा चुके, कितने परिवार शिफ्ट हुए
पिछले वर्षों में बलिया नाला के जलागम क्षेत्र में जीआईसी इंटर कॉलेज के नीचे भारी भूस्खलन हुआ है. कई घर बलिया नाले में समा चुके हैं. अब इस भूस्खलन ने राजकीय इंटर कॉलेज तल्लीताल की सीमा को छू लिया है. यह आबादी तक पहुंच गया है. नैनीताल की तरफ बढ़ने लगा है. 2018 में जिला प्रशासन ने इसके उपचार के लिए 620 करोड़ की योजना बनाई थी लेकिन वह धरातल पर नहीं उतर पाई. जिला प्रशासन ने इस क्षेत्र में 2014 में 28 परिवारों, 2016 में 25 परिवारों, 2019 में 45 परिवारों को शिफ्ट किया था. 2022 में 65 परिवारों को आवास खाली करने के नोटिस दिए थे.

बलिया नाले में 1867 में आया था पहला भूस्खलन 
नैनीताल की बलिया नाला पहाड़ी के ट्रीटमेंट के लिए इस वर्ष भी शासन ने 192 करोड़ रुपए की घोषणा की है. आपदा सचिव रंजीत सिन्हा ने कहा है कि जल्द ही हाईटेक तरीके से इसका ट्रीटमेंट कर समस्या का समाधान होगा. विदेश से कुछ बड़ी कंपनियों को भी बुलाया जा रहा है.

प्रो. कोटलिया बताते हैं कि बलिया नाला में जो चट्टानें हैं. वह चूने की चट्टानें हैं. इनमें पानी से गुफाएं बन जाती हैं. उनमें पीले रंग का पानी निकलता है. वैज्ञानिक भाषा में इसे ऑक्सीडेशन रिडक्शन कहते हैं. चार साल पहले बलिया नाले में पीला पानी निकल गया था यह उसी का नतीजा है. बलिया नाला में अंडरकटिंग हो रही है. उस पानी को और बलिया नाले के नीचे हरी नगर क्षेत्र के पानी को टैप करके सीधा नैनीताल झील में ला सकते हैं. नैनीताल नगर की पानी की समस्या भी खत्म हो जाएगी. आपको पानी के लिए कोसी नदी, शिप्रा नदी जाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी.

हर साल एक मीटर खिसक रहा है बलिया नाला
प्रो. कोटलिया कहते हैं कि उनकी स्टडी के मुताबिक ओल्ड बलिया नाला हर साल 60 सेंटीमीटर से 1 मीटर खिसक रहा है. यह बहुत ही चिंताजनक है. जिस दिन यह पूरा धंस गया उस दिन बलिया नाले के नीचे बसे सारे इलाके बर्बाद हो जाएंगे. एक भयंकर झील बन सकती है. अगर यह झील टूटी तो बहुत भयंकर प्रलय आएगी. जैसे उत्तरकाशी में वरुणा व्रत पर्वत के भूस्खलन को रोकने का तरीका अपनाया गया है, वही तरीका बलिया नाला को बचा सकता है.

नैनीताल झील तीन तरफ से पहाड़ियों से घिरी हुई है. ऊपर मल्लीताल की तरफ नैना पीक पहाड़ी, एक तरफ अयारपाटा पहाड़ी और एक तरफ शेर का डांडा पहाड़ी. नीचे तल्लीताल की तरफ नैनीताल की बुनियाद बलियानाला. अब बलिया नाले के साथ-साथ इन दोनों पहाड़ियों में भूस्खलन हो रहा है जो नैनीताल के भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं है. भूविज्ञानी बताते हैं कि नैनीताल नगर की भार सहने की क्षमता पूरी तरह खत्म हो चुकी है. अगर यहां किसी भी किस्म का निर्माण कार्य पूरी तरह से नहीं रोका गया तो नगर का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है.

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