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Wednesday, March 11, 2026
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‘हिंदू खतरे में है’ का डर फर्जी… सेक्युलर शब्द चुनना बड़ी भूल… शशि थरूर ने जानें दिए क्या तर्क

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कांग्रेस नेता और लेखक शशि थरूर की पिछले दिनों एक किताब आई, जिसका नाम है ‘अस्मिता का संघर्ष : राष्ट्रवाद, देशप्रेम और भारतीय होने का अर्थ’। इस किताब की विषयवस्तु के जरिए दीपक तैनगुरिया ने उनसे इतिहास, देशप्रेम और भारत के विचार पर लंबी बातचीत की। प्रस्तुत हैं मुख्य अंश:

अस्मिता की अवधारणा तो संवैधानिक उपक्रमों से परिभाषित हो चुकी थी। आप का कहना है कि अस्मिता में संघर्ष है, ऐसा क्यों?
हमारे देश का संविधान कहता है कि जो भी भारतीय नागरिक हैं उनकी जाति, धर्म, भाषा जो भी हो, वे सब बराबर हैं। लेकिन कुछ राजनेता कहते हैं कि यह एक पवित्र हिंदू देश है। यह जो हिंदू राष्ट्र का विचार है और संविधान में नागरिकता का विचार है, दोनों में कोई लेना-देना नहीं है। हिंदू राष्ट्र का विचार कहता है कि अगर आप एक खास धर्म से हैं तो आपको समाज में खास महत्व मिलेगा। मुसलमानों को ‘बाबर की औलाद’ बताया जाता है और कहते हैं कि वे इस देश में बाहर से आए हैं, इसलिए देश का अभिन्न हिस्सा नहीं हैं। इसी विचार को लेकर एक संघर्ष शुरू हुआ। हमें तय करना होगा कि हमारा देश बहुसांस्कृतिक है या हिंदू राष्ट्र है? क्या दूसरे धर्म के लोग अतिथि या डाकू हैं? कुछ लोग इस बात को बढ़ाते हैं, इसी वजह से यह संघर्ष हो रहा है।

यानी क्या कुछ भारतीय खुद को बाकियों से ज्यादा भारतीय मानते हैं?
हिंदुत्ववादी मानते हैं कि कुछ भारतीय बाकियों से अधिक भारतीय हैं, लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता। हां, एक गलती हमने की है सेकुलर शब्द इस्तेमाल करके। अंग्रेजी शब्दकोश में इसका मतलब धर्म से दूर रहना है, इसीलिए इसका अर्थ धर्मनिरपेक्षता हो गया। जबकि हमारे देश में ज्यादातर लोग धार्मिक हैं और हमारा देश पंथनिरपेक्ष ज्यादा है। लेकिन हिंदुत्ववादी यह नहीं मानते। उनके विचार में यह हिंदू राष्ट्र है। अगर आप मुसलमान हैं तो डाकू के जैसे आक्रमण करके हमारे देश में आए हैं। तो मुसलमानों को बराबर अधिकार नहीं मिल सकते। दूसरी बात है कि इतिहास में कई दुखी करने वाली चीजें हैं। यह सच है कि कुछ मुसलमान राजाओं ने ऐसा किया, जो नहीं करना चाहिए। लेकिन इतिहास को वर्तमान में उठाकर आप क्या करना चाहते हैं? यह सच है कि औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ का मंदिर तोड़ा, लेकिन 21वीं सदी में इन घावों को कुरेदकर कौन सा प्रयोजन सिद्ध होगा?

आपने ब्रिटिश साम्राज्य की तुलना आज से की है। इसमें क्या मिला आपको?
अंग्रेजों का मकसद अपने देश ब्रिटेन को फायदा पहुंचाना था। इसी कड़ी में उन्होंने देश को विभाजित किया। अंग्रेजों का तरीका सांप्रदायिक था। एक उदाहरण है मेरी किताब ‘अंधकार काल’ में कि एक जमाने में शिया, सुन्नी, हिंदू सब एक साथ मुहर्रम मनाते थे। अंग्रेजों के आने के बाद शियाओं को जिम्मेदारी मिली मुहर्रम मनाने की और बाकी सब धर्मों को हटा दिया। इसी के बाद दंगे शुरू हुए। इसी कारण वर्तमान और ब्रिटिश साम्राज्य में बहुत समानता है। आंबेडकर चाहते थे कि व्यक्तिगत अधिकार पर बल दिया जाए। हिंदुत्ववादी फिर से अंग्रेजी काल की तरफ जाना चाहते हैं, जहां बहुसंख्यक अल्पसंख्यक का भेद है। देश की 80 फीसदी आबादी हिंदू है और ये कहते हैं कि हिंदू खतरे में है।

अपनी किताब के दो अध्यायों- ‘यहां हम कैसे पहुंच गए’ और ‘यहां से हम कहां जाएंगे’ में आपने मौजूदा चुनौतियों से जूझने का रास्ता तलाश करने की कोशिश की है। इसके बारे में कुछ बताइए…

मेरी चिंता है कि हिंदुत्ववादी हमारी सोच को बदल रहे हैं। 7-8 साल से एक ही बात बोल रहे हैं, इस वजह से लोगों की विचारधारा बदल रही है। अल्पसंख्यक के खिलाफ जिस तरह के पक्षपात हम देख रहे हैं, पहले ऐसा करना बुरा माना जाता था। आज नेता खुलेआम ऐसी बात कहते हैं खासकर मुसलमानों के बारे में। हम तो गर्व से कहते थे कि तालिबान आया, लेकिन हमारे देश के मुसलमान कभी ऐसे तत्वों के साथ नहीं गए। पाकिस्तान से हजारों लोग चरमपंथ की ओर चले गए, मगर भारत से ज्यादा से ज्यादा 15-20 लोग क्योंकि भारत में मुसलमानों को पूरा भरोसा था कि यह उनका देश है। अगर यह बदल गया, मुसलमान अपने आप को दूसरे दर्जे का नागरिक समझने लगे और कुछ फीसदी भी अगर चरमपंथी हो गए तो यह देश की एकता के लिए बुरा होगा। मेरे बचपन में अमर, अकबर, एंथोनी जैसी फिल्मों पर टैक्स से छूट मिलती थी, जिसमें तीन धर्मों की एकता को दिखाया जाता था। लेकिन आजकल ‘कश्मीर फाइल्स’ जैसी फिल्मों का प्रदर्शन होता है। मेरी चिंता है कि आइडिया ऑफ इंडिया को इससे हानि हो रही है।

आप ने शंका व्यक्त की है कि कहीं न कहीं भारत में पाकिस्तान जैसा बनने की संभावनाएं जन्म ले सकती हैं। आपको ऐसा क्यों लगा?
पाकिस्तान मजहब के नाम बनाया गया देश है, भारत उस विचार के ठीक विपरीत बनाया गया। राष्ट्रपति, क्रिकेट कप्तान, मंत्री, न्यायाधीश इन सब स्थानों पर मुसलमान रहे हैं। यदि हमने इसके उलट कहा कि अब यह सिर्फ हिंदुओं के लिए होगा, तो भारत का चरित्र बदल जाएगा। भारत की एकता के लिए यह एक डर है, जबकि दक्षिण और उत्तर भारत में सोच अलग है। केरल और तमिलनाडु में मुसलमान तलवार लेकर नहीं आए। अरब के लोग इस्लाम आने से सैकड़ों साल पहले से व्यापार करते थे। वे नबी का संदेश लेकर आए, जैसे आदि शंकराचार्य ने केरल से बाहर हिंदू धर्म फैलाया। केरल के मुसलमानों में कोई हीन भावना नहीं है, और मैं चाहता हूं कि भारत भर में इसी किस्म की सोच हो जाए। लेकिन मेरा डर है कि उत्तर भारत इतनी तेजी से बदल रहा है कि दक्षिण भारत को लगने लगेगा कि ये किसी और तरह का देश है, और इन लोगों के साथ कैसे रहें!

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