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आधी सजा पूरी किए बिना भी मिल सकती है जमानत, ऐसा कोई नियम नहीं… सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

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नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी दोषी को आधी सजा काटने के बाद भी उसको जमानत दी जाए ऐसा कोई सख्त नियम नहीं है। अपील के दौरान दोषी की सजा सस्पेंड करने (जमानत देने) के लिए अपीलीय कोर्ट को केस का मैरिट देखना जरूरी है। अगर मैरिट के आधार पर राहत देने का मामला बनता है तो अपीलीय कोर्ट दोषी को जमानत दे सकता है यानी सजा सस्पेंड कर सकता है।

‘दोषी को इस आधार पर जमानत से वंचित नहीं कर सकते’
किसी भी दोषी को जमानत से केवल इस आधार पर वंचित नहीं किया जा सकता कि उसने आधी सजा नहीं काटी है। जस्टिस एएस ओका की अगुआई वाली बेंच ने यह टिप्पणी नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) द्वारा दायर एक अपील को खारिज करते हुए की। यह अपील हाई कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ थी, जिसमें एक दोषी की सजा को निलंबित कर दिया गया था। दोषी को नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंसेस (NDPS) अधिनियम के तहत 10 साल की सजा सुनाई गई थी। हाई कोर्ट ने इस तथ्य को देखा कि उसने पहले ही 4.5 साल की सजा काट ली थी। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने तर्क दिया कि जब तक आरोपी ने आधी सजा पूरी नहीं कर ले, तब तक उसकी सजा को निलंबित नहीं किया जा सकता।

‘आधी से ज्यादा सजा काटने का कोई कठोर नियम नहीं’
सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों 29 जनवरी को दिए फैसले में कहा कि जमानत देने के लिए आधी से ज्यादा सजा काटने का कोई कठोर नियम नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह एक वन-टाइम मेजर था, जिसे जेलों में भीड़भाड़ की समस्या से निपटने के लिए लागू किया गया था। इसे इस तरह नहीं पढ़ा जा सकता कि अदालत की जमानत देने की शक्ति सीमित हो गई है। अगर किसी मामले में सजा निलंबन या जमानत दिए जाने के उचित आधार मौजूद हैं, तो अदालत को यह अधिकार है कि वह जमानत दे या सजा को निलंबित करे, भले ही आरोपी ने आधी सजा पूरी न की हो।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक कैद और अपील में देरी होने पर जमानत दी जा सकती है। NDPS अधिनियम की धारा-37 के कठोर प्रावधानों के बावजूद, अगर कोई दोषी काफी लंबी अवधि तक जेल में रह चुका है और अपील की सुनवाई शीघ्र संभव नहीं है, तो अदालत उसे जमानत दे सकती है। अगर इस आधार पर जमानत से इनकार किया जाता है, तो यह अनुच्छेद 21 के तहत आरोपी के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा।

अपीलीय अदालतें कठोर नियमों से बंधी नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ कर दिया कि अपीलीय अदालतें कठोर नियमों से बंधी नहीं हैं और वह केस में मैरिट के आधार पर जमानत दे सकती हैं या सजा को सस्पेंड कर सकती हैं। NDPS अधिनियम की सख्ती के बावजूद, अगर अपील पेंडिंग रहने के कारण आरोपी को अनावश्यक रूप से जेल में रखना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है तो अपीलीय अदालत राहत प्रदान कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा मामले में जो स्पष्टीकरण दिया है, उसका आगे से ऐसे मामले में नजीर के तौर पर इस्तेमाल होगा।

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