नई दिल्ली
दिल्ली-एनसीआर समेत उत्तर भारत के कई इलाकों में जहरीली धुंध छाई हुई है। दिवाली से पहले ही पाकिस्तान से लेकर दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और यूपी के आसमान में प्रदूषण छा चुका है। आमतौर पर दिवाली पर जलने वाले पटाखों को प्रदूषण बढ़ाने का प्रमुख कारण माना जाता है, लेकिन इस साल पहले ही एक्यूआई बेहद खराब स्तर पर पहुंच चुकी है। सफर ऐप से अनुसार दिल्ली में शाम करीब साढ़े 6 बजे एक्यूआई 375 दर्ज किया गया, जो बेहद खराब मानी जाती है। वहीं IQAir के अनुसार सोमवार सुबह एक्यूआई 200 से ज्यादा दर्ज किया गया।
पाकिस्तान में और बुरा हाल
भारत में एक्यूआई जहां 375 के आसपास है, तो वहीं पड़ोसी देश पाकिस्तान में और बुरा हाल है। भारतीय सीमा से करीब 25 किमी की दूरी पर बसे पाकिस्तान के लाहौर शहर में सोमवार को एक्यूआई 500 को पार कर गया, जो खतरनाक स्तर माना जाता है। हवा का ये स्तर डब्ल्यूएचओ की गाइडलाइन से करीब 65 गुना है। IQAir के अनुसार, रैंकिंग के समय यह दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर था।
लोगों को हो रही सांस लेने में दिक्कत
सर्दियां बढ़ते ही उत्तर भारत के कई इलाकों में हवा की क्वालिटी खराब होने लगती है। किसानों द्वारा खेतों में पराली जलाना, कोयले से चलने वाले बिजली प्रोजेक्ट और वाहनों के धुएं की वजह से आसमान में धुंध की चादर छा जाती है। धुंध और प्रदूषण की वजह से लोगों को सांस लेने में परेशानी और आंखों में जलन जैसी शिकायतें बढ़ जाती हैं। भारत में प्रदूषण इतना भयानक हो जाता है कि एक्सपर्ट्स ने चेतावनी दी है कि ये करोड़ों लोगों के जीवन के वर्षों को कम कर सकता है।
एक दूसरे पर आरोप लगा रहीं राज्य सरकारें
एक और जहां प्रदूषण बढ़ रहा है, तो वहीं राज्य एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। दिल्ली सरकार ने प्रदूषण के लिए हरियाणा और यूपी की बीजेपी सरकार को जिम्मेदार ठहराया है, वहीं बीजेपी ने पंजाब की आम आदमी पार्टी को इसका जिम्मेदार बता रही है। दिल्ली ने दिवाली से पहले पटाखों के उपयोग और बिक्री पर बैन लगा दिया था, लेकिन इस नीति को लागू करना मुश्किल हो गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने लगाई थी फटकार
पिछले हफ्ते, भारत के सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा राज्यों की सरकारों को अवैध पराली जलाने पर रोक लगाने में विफल रहने के लिए फटकार लगाई। पराली जलाने की प्रथा में किसान खेतों को साफ करने के लिए फसल के कचरे में आग लगा देते हैं। स्थानीय अधिकारियों का दावा है कि उन्होंने हाल के वर्षों में इस प्रथा को काफी कम कर दिया है।
