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राष्ट्रध्वज पर राहुल गांधी का आरएसएस पर हमला, जानिए तिरंगे और संघ का सच क्या है?

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नई दिल्ली

‘हर घर तिरंगा’ मुहिम पर एक नया विवाद पैदा हो गया है। दरअसल, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक फेसबुक पोस्ट में बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर निशाना साधा था। राहुल ने लिखा था कि जिस तिरंगे के लिए हमारे देश के कई लोग शहीद हुए, उस तिरंगे को एक संगठन ने अपनाने से मना कर दिया, 52 सालों तक नागपुर में अपने मुख्यालय पर तिरंगा नही फहराया, लगातार तिरंगे को अपमानित किया गया और आज उसी संगठन से निकले हुए लोग तिरंगे का इतिहास बता रहे हैं, ‘हर घर तिरंगा’ मुहिम की योजना बना रहे हैं। तो क्या वाकई राहुल के आरोपों में दम है? क्या सच में आरएसएस तिरंगा से दूरी बनाता है? यहां हम आपको राहुल के आरोप से लेकर आरएसएस के तिरंगा फहराने की कहानी बताएंगे।

राहुल ने आरएसएस पर क्या लगाया है आरोप?
राहुल गांधी ने अपने पोस्ट में कहा है कि 52 सालों तक आरएसएस ने अपने मुख्यालय पर तिरंगा क्यों नहीं फहराया? खादी से राष्ट्रीय ध्वज बनाने वालों की आजीविका को नष्ट क्यों किया जा रहा है? चीन से मशीन निर्मित, पॉलिएस्टर झंडे के आयात की अनुमति क्यों दी गई? राहुल ने कहा कि आरएसएस ने अपने मुख्यालय पर आजादी के 52 साल बाद तक तिरंगा नहीं फहराया और अब यह सब ‘पांखड’ किया जा रहा है। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से 13 अगस्त से 15 अगस्त के बीच अपने-अपने घरों में राष्ट्रध्वज फहराकर ‘हर घर तिरंगा’ मुहिम को मजबूत करने की शुक्रवार को अपील की थी। मोदी ने ट्वीट के जरिए कहा था कि यह मुहिम तिरंगे के साथ हमारे जुड़ाव को गहरा करेगी। उन्होंने उल्लेख किया कि 22 जुलाई, 1947 को ही तिरंगे को राष्ट्रध्वज के रूप में अपनाया गया था।

RSS का क्या जवाब
आरएसएस ने अपने सोशल मीडिया खातों पर तिरंगे की तस्वीर नहीं लगाने के लिए हो रही आलोचना का बुधवार को जवाब दिया था। संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने कहा कि ऐसी चीजों का राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए। आरएसएस पहले ही ‘हर घर तिरंगा’ और ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ कार्यक्रमों को समर्थन दे चुका है। संघ ने जुलाई में सरकारी और निजी निकायों और संघ से जुड़े संगठनों द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में लोगों तथा स्वयंसेवकों के पूर्ण समर्थन और भागीदारी की अपील की थी। आंबेकर ने किसी का नाम लिए बगैर आरोप लगाया कि जो पार्टी ऐसे सवाल उठा रही है वह देश के विभाजन के लिए जिम्मेदार है। सोशल मीडिया पर उठाए जा रहे सवालों के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने सीधे कोई जवाब नहीं दिया और कहा कि यह एक प्रक्रिया है। इसे हमें देख लेने दीजिए। हम विचार कर रहे हैं कि इसे कैसे मनाया जाए। संघ पहले ही अपना रुख साफ कर चुका है और अमृत महोत्सव के संबंध में केंद्र द्वारा शुरू किए गए सभी कार्यक्रमों का समर्थन करता है।

RSS तिरंगा विवाद क्या है?
दरअसल, आरएसएस पर तिरंगा मन से नहीं अपनाने का आरोप लगता रहा है। आरएसएस संस्थापकों में शामिल माधव सदाशिव गोलवलकर पर लिखी पुस्तक गोलवलकर, श्री गुरुजी समग्र दर्शन, भारतीय विचार साधना, नागपुर खंड-1 पृष्ठ 98 में उनके भारतीय ध्वज को लेकर विचार लिखे हुए हैं। इसमें लिखा है कि हमारी महान संस्कृति का परिपूर्ण परिचय देने वाला प्रतीक स्वरूप हमारा भगवा ध्वज है जो हमारे लिए परमेश्वर का रूप है। इसी परम वंदनीय ध्वज को हमने अपने गुरुस्थान में रखना उचित समझा है। यह हमारा ढृढ़ विश्वास है कि अंत में इसी ध्वज के समक्ष सारा राष्ट्र नतमस्तक होगा। इन्हीं बातों को लेकर विरोधी बीजेपी और आरएसएस को तिरंगा विवाद में घेर रहे हैं।

RSS पर प्रतिबंध, पटेल की चिट्ठी
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या के बाद पूरे देश के लोग स्तब्ध थे। देश के तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने 1948 में आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिए थे। 4 फरवरी 1948 को केंद्र सरकार ने एक आदेश जारी कर कहा था कि जो देश की आजादी को खतरे में डालने का काम कर रहे हैं, उन्हें सरकार जड़ से उखाड़ने के लिए प्रतिबद्ध है। इसी के तहत RSS को गैरकानूनी घोषित करने का फैसला किया गया है। 1948 में गोलवलकर ने पटेल को एक चिट्ठी लिखी और संघ पर से प्रतिबंध हटाने की अपील की थी। इसपर पटेल ने कहा था कि ये जरूर है कि आरएसएस ने हिंदू समाज की सेवा की है और जहां जरूरत महसूस हुई वहां उसने हिस्सा भी लिया। हालांकि, उन्होंने आगे कहा था कि हिंदुओं की मदद करना एक बात है लेकिन गरीब, महिला और बच्चों पर हमला सही नहीं है। इस चिट्ठी के बाद गोलवलकर और पटेल में दो बार मुलाकात हुई और फिर 11 जुलाई 1949 को संघ पर से प्रतिबंध हटा लिया गया। पटेल ने भारतीय ध्वज और संविधान के प्रति वफादार रहने की शपथ लेने की शर्त पर प्रतिबंध हटाने का फैसला किया था।

52 साल बाद नागपुर में संघ मुख्यालय में तिरंगा
26 जनवरी 2002 में नागपुर में आरएसएस के मुख्यालय में 52 साल बाद पहली बार तिरंगा फहराया गया था। तिरंगा को लेकर गोलवलकर के दावे पर पटेल ने कहा था कि राष्ट्रीय ध्वज को सभी को मानना होगा अगर किसी को ये लगता है कि राष्ट्रीय ध्वज का वैकल्पिक ध्वज होना चाहिए तो इसके लिए सही तर्क होना चाहिए। लेकिन वह झंडा खुला और संवैधानिक होना चाहिए। मई 1949 में तत्काली केंद्रीय गृह सचिव एचवीआर अयंगर ने गोलवलकर को एक पत्र लिखा था कि राष्ट्र ध्वज को साफ-साफ स्वीकार करना (भगवा ध्वज संघ का सांगठनिक ध्वज हो सकता है) देश को यह बताने के लिए जरूरी होगी कि इसके लेकर संघ को कोई संदेह नहीं है।

1947, 1950 में भी संघ ने फहराया था तिरंगा
आरएसएस सूत्रों के अनुसार, संघ ने 15 अगस्त 1947 और 26 जनवरी 1950 को तिरंगा फहराया था। इसके बाद आरएसएस ने तिरंगा 2002 तक नहीं फहराया था। संघ के जानकार राकेश सिन्हा तिरंगा को लेकर राजनीति करने पर कांग्रेस को घेरा। उन्होंने कहा कि तिरंगा हमारी साझी विरासत है। इसका विरोध नहीं किया जाना चाहिए। राष्ट्रवादी संस्कार कांग्रेस को सुहाता नहीं है। आरएसएस ने राहुल गांधी को गंभीरता से लेना बंद कर दिया है। आरएसएस ने 1930 से झंडे का अभिनंदन कर रही है। संघ में राष्ट्रभक्ति पहला और अंतिम शब्द है। आरएसएस शुरू से भारतीय अखंडता दिवस मनाता रहा है। कांग्रेस के पास इतिहास बोध नहीं है। इसका इतिहास बोध नेहरू-गांधी तक ही सीमित है।

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