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बिहार में NDA-महागठबंधन दोनों फेर में फंसे, जानिए कैसे ‘SO’ फैक्टर ने बढ़ा दी है टेंशन

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पटना

मोकामा और गोपालगंज के बाद बिहार में एक और उपचुनाव की तैयारी तेज होने लगी है। कुढ़नी उपचुनाव को लेकर सूबे में सियासी पारा चढ़ने लगा है। राजनीति के दांव-पेंच सबकुछ मुख्य विधानसभा चुनाव की तरह है। मोकामा और गोपालगंज उपचुनाव तो कुछ कम पेंचीदिगियों के साथ गुजर गए। लेकिन कुढ़नी विधानसभा क्षेत्र का होने वाला चुनाव नामांकन के पहले ही काफी कठिन हो गया है। यहां बीजेपी-महागठबंधन से कैंडिडेट्स पर फैसले के साथ ही मुकेश सहनी और ओवैसी (SO) फैक्टर भी अहम है। राजनीतिक गलियारों की बात करें तो कुछ कम कटीली नहीं है राह कुढ़नी की।

महागठबंधन के सामने ये मुश्किलें
महागठबंधन सात दलों का गठबंधन है। यह वे दल हैं जिनकी महत्वकांक्षा सिर चढ़कर बोलती है। महागठबंधन के बीच सबसे पहली परेशानी तो यह है कि चुनाव कौन लड़ेगा। स्थिति यहां यह है कि साल 2020 के विधानसभा चुनाव में आरजेडी के उम्मीदवार अनिल सहनी की जीत हुई थी। यह सीट आरजेडी के विधायक अनिल सहनी के सजायाफ्ता होने के कारण खाली हुई है। ऐसे में दावा तो यहां प्रथम दृष्टया आजेडी का बनता है।

आरजेडी नेताओं को यह उम्मीद है कि अनिल सहनी के परिवार से कोई खड़ा होता है तो उसे सहानुभूति वोट भी मिलेगा। एमवाई तो आरजेडी के लिए टेकन फॉर ग्रांटेड हैं ही, अनिल सहनी वैसे भी पहले जेडीयू में थे। इस बहाने वे जेडीयू कार्यकर्ता से भी संपर्क में हैं। सूत्र बताते हैं कि अगर जनता दल यूनाइटेड ने जिद की तो यह सीट आरजेडी को छोड़नी भी पड़ सकती है।

मुकेश सहनी VIP ने बढ़ाई टेंशन
दूसरी परेशानी यह है कि महागठबंधन में एक समय शामिल रही वीआईपी ने अपनी तरफ से चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है। इससे महागठबंधन की परेशानी बढ़ गई है। कुढ़नी में निषाद वोटर्स की अच्छी संख्या है। अगर टिकट देते हैं तो ठीक नहीं तो ये निषाद वोट महागठबंधन की राह में रोड़े अटका सकते हैं।

जेडीयू या आरजेडी? किसका से होगा कैंडिडेट
महागठबंधन के भीतर उम्मीदवार किस दल से लाए जाएंगे यह अभी तक फैसला नहीं हुआ है। जेडीयू के मनोज कुशवाहा इस सीट के प्रबल दावेदार माने जा रहे। ऐसा इसलिए क्योंकि 2005 से 2015 तक वे यहां से जीतते रहे हैं। अभी तक दो विधानसभा का उपचुनाव आरजेडी ने ही लड़ा है। सूत्र बताते हैं कि गठबंधन धर्म के तहत एक सीट मांगी जा सकती है।

बीजेपी में भी परेशानी कम नहीं
बीजेपी भी कम परेशान नहीं है। अभी मुजफ्फरपुर में भूमिहार बनाम वैश्य की लड़ाई जारी है। यह लड़ाई जो वर्ष 2020 के चुनाव में शुरू हुई वो अभी तक जारी है। इस झगड़े की जड़ में है मुजफ्फरपुर का विधानसभा चुनाव। कहा जाता है कि इस चुनाव में बीजेपी के कोर वोटर वैश्य ने सुरेश शर्मा को वोट नहीं दिया। तो नाराज भूमिहार मतदाताओं ने बोचहां विधानसभा चुनाव में बीजेपी उम्मीदवार को वोट नहीं दिया। इसे लेकर मुजफ्फरपुर में अभी भी तनातनी बनी है। वहां से बीजेपी की टिकट पर चुनाव लड़ने के लिए केदार गुप्ता सबसे प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं। एक सूचना यह भी है कि अगर कुढ़नी विधानसभा उपचुनाव आरजेडी के हिस्से में चली गई तो मनोज कुशवाहा भी बीजेपी के उम्मीदवार हो सकते हैं। कहा जा रहा है कि भूमिहार के कुछ कद्दावर नेता भी भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के संपर्क में हैं।

कुढ़नी में क्या है जातीय समीकरण
कुढ़नी में जातीय समीकरण पर नजर डालें तो यहां भूमिहार, कोयरी और निषाद फैक्टर महत्वपूर्ण हैं। इनके सपोर्ट में वैश्य, यादव और मुस्लिम मतों की साझेदारी जिस उम्मीदवार के लिए बनती है राह उसी की आसान होने जा रही है।

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