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Thursday, May 7, 2026
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कश्मीर से शॉल बेचने आया तो दोस्ती हुई, मुस्लिम गाइड ने बताया कैसे बचाई 11 लोगों की जान, पहलगाम की इमोशनल स्टोरी

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रायपुर

जम्मू कश्मीर के पहलगाम में जब मंगलवार को आतंकवादी हमला हुआ तो एक कश्मीरी गाइड ने अपनी जान जोखिम में डालकर छत्तीसगढ़ के 11 पर्यटकों की जान बचाई। नजाकत अहमद शाह ने छत्तीसगढ़ के मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले के 11 लोगों के ग्रुप के गाइड थे। नजाकत अहमद शाह सर्दियों में छत्तीसगढ़ के गांवों और शहरों में घूम-घूमकर कश्मीरी शॉल और कपड़े बेचने आते थे। इसी दौरान उनकी इस परिवार से दोस्ती हो गई।

कश्मीर में गाइड के रूप में काम करने वाले नजाकत अहमद शाह ने बताया कि वे सर्दियों के मौसम में अक्सर छत्तीसगढ़ आते हैं। चिरमिरी शहर तथा आसपास के गांवों में तीन महीने शॉल बेचते हैं। इस दौरान शाह की पहचान अरविंद अग्रवाल और उनके साथियों से हो गई थी। इस दौरान उन्होंने अग्रवाल परिवार और उनके साथियों को कश्मीर घूमने आने का न्योता दिया था।

17 अप्रैल को पहुंचे थे कश्मीर
अग्रवाल परिवार अपने ग्रुप के साथ 17 अप्रैल को जम्मू पहुंचा था और कश्मीर की सैर कर वह पहलगाम होकर वापस छत्तीसगढ़ लौटने वाले थे। जब वह मंगलवार को बैसरन घाटी में थे तब आतंकवादियों ने वहां हमला कर दिया। गोलीबारी के दौरान अरविंद अग्रवाल और उनका समूह भी वहां था, जिसे नजाकत शाह ने वहां से निकाला। उन्होंने बताया कि वे 17 अप्रैल को जम्मू पहुंचे और मैं उन्हें जम्मू से दो वाहनों में कश्मीर आए। श्रीनगर, गुलमर्ग, सोनमर्ग घूमाने ले गया। इसके बाद उनके टूर का आखिरी पड़ाव पहलगाम था।

शाह ने कहा कि पहलगाम को आखिरी जगह के तौर पर तय किया गया था क्योंकि मेरा गांव पहलगाम के करीब है और मैं उनकी मेजबानी करना चाहता था। हम दोपहर करीब 12 बजे बैसरन घाटी पहुंचे। मेरे पर्यटक टट्टू की सवारी और तस्वीरें खींचने में व्यस्त थे। करीब दो बजे मैंने कहा कि हमें देर हो रही है, इसलिए हमें जाना चाहिए। उसने कहा कि हम कुछ और तस्वीरें खींचने के बाद जाएंगे। जब हम बात कर रहे थे, तभी हमने गोलियों की आवाज सुनीं। पहले तो हमें लगा कि यह पटाखे फोड़ने की आवाज है। अचानक हमें एहसास हुआ कि यह गोलियों की आवाज है। वहां हजारों पर्यटक थे जो घबराकर इधर-उधर भाग रहे थे।

पर्यटकों को बचाना मेरी जिम्मेदारी थी
उन्होंने बताया, ”मेरी पहली चिंता पर्यटक परिवारों की सुरक्षा थी। मैंने लकी के बच्चे और दूसरे बच्चे को अपने हाथ में लिया और ज़मीन पर लेट गया। उस इलाके में बाड़ लगी हुई थी, इसलिए भागना आसान नहीं था। मैंने बाड़ में एक छोटा सा कट देखा और परिवारों से वहां से चले जाने को कहा। परिवार ने मुझसे पहले बच्चों को बचाने को कहा। मैं वहां से दोनों बच्चों के साथ निकल गया और पहलगाम भाग गया।”

आतंकी हमले में मारा गया भाई
शाह ने बताया, ”मैं फिर से वापस गया क्योंकि परिवार के कुछ सदस्य पीछे रह गए थे और उन्हें पहलगाम ले आया। हमारे सभी 11 मेहमानों को सुरक्षित पहलगाम ले गया।” उन्होंने बताया, ”मेरे भाई (मामा के बेटे) आदिल हुसैन आतंकवादी हमले में मारे गए। मैं उनके जनाजे में शामिल नहीं हो सका क्योंकि मैंने अपने पर्यटकों को पहले सुरक्षित श्रीनगर छोड़ने का फैसला किया।” शाह ने बताया, ‘‘ मैं उन्हें कई वर्षों से जानता हूं क्योंकि पहले मैं अपने पिता के साथ चिरमिरी में शॉल बेचने जाता था।” नजाकत शाह की दो बेटियां हैं। उन्होंने कहा, ”मैं चाहता था कि मेरे मेहमान बच जाएं, भले ही मैं न बचूं। मैं नहीं चाहता था कि जो लोग खुशी लेकर यहां आए हैं वह मातम लेकर जाएं।”

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