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अंग्रेजों को टक्कर देने वाली ‘गरीबों की दवा कंपनी’ बिक रही, परिवार में नहीं कोई संभालने वाला

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नई दिल्ली

देश की सबसे बड़ी फार्मा कंपनी सिप्ला यानी कंपनी बिकने जा रही है। 1.2 लाख करोड़ के मार्केट कैप वाली यह कंपनी विदेशी कंपनी के हाथों बिकने जा रही है। इस कंपनी को खरीदने की रेस में दुनिया की सबसे बड़ी एक्विटी फर्म ब्लैकस्टोन ( Blackstone) सबसे आगे चल रही है। ब्लैकस्टोन ने LP(लिमिटेड पार्टनर्स ) के साथ मिलकर सिप्ला के साथ अधिग्रहण के लिए नॉन बाइंडिंग बोली लगाई है। हम आपको यहां बता दें कि सिप्ला अभी बिकी नहीं है, लेकिन बिकने की स्थिति बनती जा रही है।

​बिक रही है देश की सबसे पुरानी दवा कंपनी​
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक ख्वाजा हमीद की फैमिली कंपनी में अपनी पूरी 33.47 फीसदी की हिस्सेदारी बेचने जा रही है। सिप्ला देश की सबसे पुरानी दवा कंपनी है, जो मुनाफे से ज्यादा इस बात पर जोर देती है कि दवा की कीमत कम रखी जाए। कंपनी को गरीबों की दवा कंपनी तक कहा जाता है, लेकिन अब यह कंपनी बिकने जा रही है। साल 1935 में, यानी आजादी से पहले शुरू हुई इस कंपनी की डील अगर ब्लैकस्टोन से हो जाती है तो इसका कमान एक भारतीय के हाथों से निकलकर विदेशी के हाथों में चली जाएगी।

​क्यों बिक रही है कंपनी​
सिप्ला की बिकने की खबरों से लोगों को झटका लगा है। सबसे मन में सवाल यही आया कि मुनाफा कमाने के बाद भी आखिर कंपनी बिक क्यों रही है। दरअसल सिप्ला उत्तराधिकारी के अभाव से जूझ रही है। कंपनी बिकने की एक बड़ी वजह उत्तराधिकारी की कमी है। अगर सिप्ला के उत्तराधिकार योजनाएँ को देखें तो तस्वीर साफ हो जाएगी। साल 1935 में ख्वाजा अब्दुल हमीद ने कंपनी की शुरुआत की। जब वो रिटायर होने लगे तो उन्होंने कंपनी की कमान युसूफ हमीद को सौंप दी। युसूफ हमीद 80 साल के हो चुके हैं। युसूफ हामिद (चेयरमैन) और एमके हामिद ( वाइस चेरयमैन)दोनों सेकेंड जेनरेशन के हैं और दोनों की उम्र हो चुकी है। साल 2015 में सिप्ला के बोर्ड में शामिल हुईं समीना हामिद हामिद फैमिली के थर्ड जेनरेशन हैं और फिलहाल कंपनी को वहीं संभाल रही है।

​उत्तराधिकारी का अभाव​
समीना कंपनी की एग्जीक्यूटिव वाइस चेयरपर्सन हैं। समीना हामीद फैमिली की दूसरी की एकमा्त्र सदस्य हैं तो कंपनी को संभाल रही है। यानी इस परिवार में कंपनी को संभालन वाला आगे कोई नहीं है। ऐसे में हामीद फैमिली सिप्ला कंपनी के नेतृत्व के लिए एक स्पष्ट रोडमैप की जरूरत महसूस हो रही है। हालांकि सिप्ला के नेतृत्व का मसला लंबे समय से चिंता का विषय बना हुआ है। कंपनी को एक स्पष्ट नेतृत्व मिल सके, इसलिए हामीद फैमिली कंपनी में अपनी पूरी हिस्सेदारी बेचने पर विचार कर रही है। इस खबर के सामने आने के बाद से कंपनी के शेयर चढ़ रहे हैं।

​कैसे हुई शुरुआत​
सिप्ला का नाम आप सब जानते होंगे। ख्वाजा हमीद जर्मनी में केमिस्ट के तौर पर काम कर रहे थे। जबव वो भारत लौटे तो उन्होंने देखा की देश की बड़ी जनसंख्या महंगी दवा खरीदने में असमर्थ है। उन्होंने उसी वक्त ठान लिया कि वो गरीबों के लिए दवा बनाएंगे। साल 1935 में सिप्ला की शुरुआत की। उनके इस कदम को महात्मा गांधी से लेकर पंडित नेहरू और नेताजी सुभाष तक ने सराहा। ख्वाजा हमीद ने सस्ती और स्वदेशी दवाईयां विदेशी कंपनियों के दबदबे को चुनौती देने लगी।

​बदलना पड़ा कानून​
भारत में जेनरिक दवाईओं की शुरुआत सिप्ला ने की थी। साल 1972 में सिप्ला ने हृदय रोगों के इलाज की दवा Propranolol का जेनेरिक वर्जन तैयार किया। इस दाव को लेकर ब्रिटिश कंपनी इम्पीरियल केमिकल इंडस्ट्रीज ने उनपर केस कर दिया। इसके बाद युसूफ हामीद ने तात्कालिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मुलाकात की और सवाल किया कि क्या लाखों भारतीयों को जान बचाने वाली दवा सिर्फ इसलिए नहीं मिलनी चाहिए क्योंकि उस दवा को बनाने वालों को हमारे लोग पसंद नहीं है। इसके बाद भारत सरकार ने पेटेंट का कानून बदल दिया। सिप्ला के इस कदम से देश में सस्ती और जेनरिक दवाओं का रास्ता खोल दिया।

​फ्री में बांटी एड्स की दवाएं​
देश की जब-जब जरूरत पड़ी तब-तब सिप्ला आगे रहा है। कोविड के दौर में भी सिप्ला से सस्ती दवाएं बांटकर लोगों की मदद की। साल 2000 के आसपास तक एड्स का प्रकोप अमेरिका, यूरोप तथा अफ्रीकी देशों में फैला हुआ था। इसकी दवा इतनी महंगी थी कि बहुत से लोग इसे खरीद नहीं पा रहे थे। उस समय सिप्ला ने एड्स की न सिर्फ कम कीमत वाली दवा बनायी, कंपनी ने दवा की तकनीक को गरीब देशों को बांट दिया।

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