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Thursday, April 2, 2026
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ये दुनिया पित्तल दी जिसकी फीकी चमक ने पांच लाख लोगों का उजियारा कम कर दिया

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जामनगर

ये दुनिया पित्तल दी, बेबी डॉल मैं सोने दी.. ये गाना आपने सुना होगा जिसमें नायिका खुद को सोना और दुनिया को पीतल जैसी बता रही है। बॉलीवुड से बहुत अलग है पीतल इंडस्ट्री की सच्चाई। ये बात सही है कि पीतल की दुनिया को संवारने वाले हमेशा कालिख में जीते हैं और इसे एक्सपोर्ट करने वाले सोने जैसी जिंदगी। लेकिन रूस-यूकेन जंग ने पीतल से सोने जैसी जिंदगी जीने वालों की नींद हराम कर रखी है। हां, पीतल के कारखानों में काम करने वाले कामगारों का शरीर गलना जरूर घट गया है। लेकिन दर्द घटने से ये कामगार भी निराश हैं। दिहाड़ी जो घट गई। हम हैं भारत की ब्रास इंडस्ट्री के हब जामनगर में जहां 7,000 ब्रास पार्ट बनाने वाली फैक्ट्रियों पर पांच लाख लोगों की जिंदगी निर्भर करती है। जंग के कारण कच्चे माल की आवक 80 परसेंट घट गई है और चीन तेजी से मौके का फायदा उठाकर एक्सपोर्ट मार्केट में भारत की जगह ले रहा है।

इस हब में आने पर पता चला कि पीतल इंडस्ट्री का 80 परसेंट कच्चा माल अमेरिका और 20 परसेंट अफ्रीका से आता है। जंग ने इस पर ब्रेक लगा दिया है। ऊपर से भारत सरकार ने इंपोर्ट ड्यूटी भी बढ़ा दिया है ऐसा कई फैक्ट्री मालिकों ने बताया। एक साल पहले ब्रास स्क्रैप लगभग 300 रुपये किलो मिलता था जिसका भाव अब 500 रुपये किलो पर चला गया है। इसके कारण सारे मालिक परेशान हैं। कच्चा माल नहीं होने से फैक्ट्रियां हफ्ते में तीन-चार दिन ही चल रही हैं। वो भी कई बार ऑर्डर बुक कम रहने पर जल्दी छुट्टी हो जाती है।

यूपी-बिहार के मजदूरों पर मार
इसकी मार पड़ी है यहां काम करने वालों पर जिनमें बिहार-यूपी से आने वाले मजदूर भी शामिल हैं। धनराज ने बताया कि थोड़ा मंदी चल रहा है, चार-पांच दिन चल रहा है। कोरोना के कारण एक्सपोर्ट नहीं हो रहा है। माल में मंदी चल रहा है। हम लोगों पर असर पड़ रहा है। हर चीज की महंगाई हो गई है। बाहर दाम डबल हो गया है। मैं मोल्डर का काम करता हूं। बहुत रिस्क भी रहता है। कई बार धमाका हो जाता है। अभी भाजपा का कांग्रेस का क्या चल रहा है पता नहीं है। इलेक्शन होगा तब पता चलेगा। नौकरी पर भी खतरा होता है न। सेठ के पास ऑर्डर होगा तब बुलाएगा न।

धनंजय सिंह राख को पैर से सांचे में भर रहे हैं। ये पीतल को गलाने के काम आता है। ये भी मंदी से परेशान है। एक और फैक्ट्री में गए तो लक्ष्मण भाई मिले। बोले, ‘340 रुपया मिलता है और एक साल में दस रुपया बढ़ता है।’ वो भी मंदी की हालत से परेशान हैं। ये मजदूर जिन हालात में काम कर रहे थे उसका अंदाजा आप इन तस्वीरों को देखकर लगा सकते हैं। पूरे दिन मेटल टॉक्सिक से एक्सपोज होना पड़ता है। डॉक्टर दर्शना पंड्या ने अपने रिसर्च में पाया कि यहां के 200 मजदूरों में से अधिकतर मेटल टॉक्सिटी के शिकार हैं। 10 मजदूरों के बॉडी में तो शीशे की मात्रा पाई गई। 36 परसेंट के बॉडी में खून की मात्रा कम पाई गई। यहां के एक स्थानीय पत्रकार ने बताया कि आठ दस साल काम करने के बाद इनका शरीर एक तरह से गलने लगता है और ये कोई और काम नहीं कर पाते।

फैक्ट्री मालिकों का दर्द
फैक्ट्री मालिक भरत हंसराजोटिया बताते हैं, ‘पिछले दो साल में कोरोना से हालत खराब थी। अभी थोड़ा थोड़ा चलने लगा है। ब्रास की ड्यूटी थोड़ा कम हो जाए तो और फायदा हो जाएगा। हमारा एमएसएमई है। प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से साढ़े तीन लाख लोग इस पर निर्भर हैं। पहले फैक्ट्री सात बजे तक चलता था। अब तीन बजे तक चलता है।’ दूसरे फैक्ट्री मालिक मनसुख भाई कहते हैं कि कच्चा माल एक किलो पर सौ रुपया बढ़ गया है। जरूरत के लायक ही मजदूर रखते हैं। बाकी को फ्री कर देते हैं। वे लेबर लॉ में संशोधन की मांग भी करते हैं।

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