नई दिल्ली,
संसद का मॉनसून सत्र पहले दिन से ही विपक्ष के हंगामे की भेंट चढ़ रहा है. दरअसल वह मणिपुर में 3 मई से जारी हिंसा के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जवाबदेही तय करने और इस हिंसा पर बहस करने की मांग कर रहा है. हालांकि गृहमंत्री अमित शाह और राजनाथ सिंह समेत कई नेता बार-बार सदन में इस मुद्दे पर खुलकर बहस करने की बात कह रहे हैं लेकिन विपक्ष इसके लिए तैयार नहीं है. वह चाहता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संसद में इस पर जवाब दें.
यही वजह है कि विपक्षी गठबंधन INDIA की तरफ से कांग्रेस ने बुधवार को संसद में सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दे दिया. इसी के साथ ही कांग्रेस ने कहा कि सरकार पर से लोगों को भरोसा टूट रहा है. हम चाहते हैं कि पीएम नरेंद्र मोदी मणिपुर हिंसा पर कुछ बोलें लेकिन वह बात ही नहीं सुनते. पीएम सदन के बाहर तो बात करते हैं लेकिन सदन में कुछ नहीं बोलते. आइए समझते हैं कि आंकड़े न होने के बाद भी कांग्रेस यह अविश्वास प्रस्ताव क्यों ला रही है. उसके इस कदम के पीछे क्या प्लान है?
कांग्रेस समेत विपक्षी दलों के अविश्वास प्रस्ताव लाने के पीछे के राजनीतिक मायने समझने से पहले यह जान लेते हैं कि क्या यह अविश्वास प्रस्ताव टिक भी पाएगा और इसे लाने का क्या नियम है.अगर लोकसभा में किसी विपक्ष दल को लगता है कि सरकार के पास बहुमत नहीं है या सरकार सदन में विश्वास खो चुकी है, तो वह अविश्वास प्रस्ताव ला सकता है. संविधान के अनुच्छेद-75 के अनुसार, केंद्रीय मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति जवाबदेह है. अगर सदन में बहुमत नहीं है, तो पीएम समेत पूरे मंत्रिपरिषद को इस्तीफा देना होता है.
कोई सदस्य लोकसभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियमावाली के नियम 198(1) से 198(5) के तहत लोकसभा अध्यक्ष को सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दे सकता है. इसके लिए उसे सुबह 10 बजे से पहले प्रस्ताव की लिखित सूचना देनी होती है. साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होता है कि उस प्रस्ताव को कम से कम 50 सांसदों ने स्वीकृति दी हो. इसके बाद अगर लोकसभा स्पीकर अविश्वास प्रस्ताव को मंजूरी दे देते हैं, तो प्रस्ताव पेश करने के 10 दिनों के भीतर इस पर चर्चा जरूरी है.
वैसे लोकसभा में मोदी सरकार बहुमत में है. उसके पास 301 सांसद हैं, वहीं एनडीए के पास 333 सांसद हैं. इधर पूरे विपक्ष के पास कुल 142 सांसद हैं. कांग्रेस के पास सबसे ज्यादा 50 सांसद हैं. ऐसे में स्पष्ट है कि विपक्ष का अविश्वास प्रस्ताव फेल हो जाएगा.
पीएम मोदी को बयान देने पर विवश करना
विपक्ष आरोप लगाता रहा है कि पीएम नरेंद्र मोदी अहम मुद्दों पर मौन साथ लेते हैं. इससे पहले भी वह कई मुद्दों जैसे-राहुल की सदस्यता, महिला पहलवानों का मुद्दा व अडानी-हिंडनबर्ग मामले पर चुप्पी साध चुके हैं. विपक्ष की कई मांगों के बाद भी वह मौन रहे हैं. ऐसे में वह अविश्वास प्रस्ताव लाकर पीएम मोदी को बोलने पर मजबूर करेंगे और यह प्रचारित करने की कोशिश करेंगे कि गंभीर मुद्दों पर जवाब देने से बच रहे पीएम मोदी को विपक्षी एकता ने बोलने पर मजबूर कर दिया.
मणिपुर के मुद्दे पर माहौल बनाना
मणिपुर पिछले 84 दिन से सुलग रहा है. दरअसल यहां 3 मई से मैतेई (घाटी बहुल समुदाय) और कुकी जनजाति (पहाड़ी बहुल समुदाय) के बीच खूनी संघर्ष हो रहा है. दरअसल, मैतेई समाज खुद के लिए एसटी दर्जे की मांग कर रहा है और कुकी समाज इसका विरोध कर रहा है. इस हिंसा में अब तक करीब 130 लोगों की मौत हो चुकी है, 400 से ज्यादा बुरी तरह जख्मी हो चुके हैं. यहां पिछले दिनों दो कुकी महिलाओं को निर्वस्त्र कर सड़क पर परेड कराने, उनमें से एक महिला का गैंगरेप करने का मामला सामने आया था, जिसके बाद से वहां माहौल और उग्र हो गया है.
हालात इतने बिगड़ने के बाद भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 19 जुलाई तक कोई बयान नहीं जारी किया. कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दल इसी बात को लेकर नाराज हैं. वे इस हिंसा को लेकर पीएम नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और मणिपुर के सीएम एन बीरेन सिंह की जवाबदेही तय करने की मांग कर रहे हैं. 20 जुलाई को पीएम ने महिलाओं को निर्वस्त्र घुमाने का वीडियो सामने आने के बाद बयान दिया था लेकिन उसी दिन से शुरू हुए संसद के मॉनसून सत्र में घटना पर बात नहीं की.
इससे विपक्ष और भड़क गया और सदन में मणिपुर हिंसा पर बहस के लिए और पीएम मोदी से जवाब चाहने के लिए आविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दे दिया है. विपक्ष संसद में मणिपुर का मुद्दा उठाकर सरकार को घेरने की कोशिश करेगी. वह इसके जरिए यह स्टैब्लिश करने की कोशिश करेगी सरकार मणिपुर के मुद्दों को सुलझाने में नाकाम साबित हुई है. सरकार की लापरवाही की वजह से हालात बिगड़ते चले गए. सरकार की उदासीनता के कारण मणिपुर के लोग ऐसा दंश झेल रहे हैं. इसके अलावा विपक्ष मणिपुर में राष्ट्रपति शासल लागू करने का भी दबाव डाल सकता है.
नए गठबंधन की ताकत दिखाना
पटना में बाद बेंगलुरु में विपक्षी दलों की बैठक हुई थी. इसमें 26 दलों के नेता शामिल हुए थे. विपक्ष ने आगामी लोकसभा चुनाव के लिए पीएम नरेंद्र मोदी और एनडीए को टक्कर देने के लिए यूपीए को खत्म कर नए गठबंधन I.N.D.I.A. (Indian, National, Democratic, Inclusive, Alliance) का ऐलान किया था. इसके बाद संसद का मॉनसून सत्र पहला मौका है, जहां विपक्षी दलों को अपने गठबंधन की ताकत दिखाने का मौका मिला है. विपक्ष कोशिश कर रहा है कि वह अपनी शर्तों पर, अपने मुद्दों पर सरकार को जवाब देने पर मजबूर करे.
अगर वह ऐसा कर ले जाते हैं तो यह विपक्ष की एक तरह की जीत मानी जाएगी, इसीलिए विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव लाकर एक दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है. फिलहाल स्पीकर ने अविश्वास प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया है. ऐसे में अब लगभग तय हो गया है कि प्रधानमंत्री को मणिपुर के मुद्दे पर जवाब देना पड़ेगा.
