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चुनावी रेवड़ियां सरकारी खजाने पर भारी! कर्नाटक ही नहीं, इन राज्यों पर भी बड़ा बोझ

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नई दिल्ली,

फ्रीबीज के चुनावी वादे कैसे सरकारी खजाने पर भारी पड़ रहे हैं? इसका ताजा उदाहरण कर्नाटक है. कर्नाटक के डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार ने कहा कि चुनाव के वक्त कांग्रेस ने जो पांच गारंटी दी थीं, उन्हें पूरा करने के लिए 40 हजार करोड़ रुपये अलग रखे गए हैं. इसलिए इस साल नए डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के लिए पैसा नहीं दे सकते हैं.

डीके शिवकुमार ने कहा, ‘पिछली भाजपा सरकार ने राज्य को दिवालिया बना दिया है. अब हमारी जिम्मेदारी है कि हम उनकी गलतियों को सुधारें और अपनी गारंटी के लिए फंड की व्यवस्था करें.’ इस पर बीजेपी हमलावर हो गई. बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने ट्वीट कर कहा कि कांग्रेस कर्नाटक को बर्बाद कर देगी. पांच गारंटी लागू होने के भी कोई संकेत नहीं हैं. और अब विकास भी नहीं होगा.

क्या है कांग्रेस की 5 गारंटी?
1. गृह ज्योति के तहत सभी परिवारों को 200 यूनिट तक बिजली हर महीने मुफ्त..
2. गृह लक्ष्मी के तहत हर परिवार की महिला मुखिया को दो हजार रुपये की मदद दी जाएगी.
3. अन्न भाग्य के तहत बीपीएल परिवार के हर सदस्य को हर महीने 10 किलो चावल मुफ्त.
4. युवा निधि के तहत दो साल तक 18 से 25 साल के बेरोजगार ग्रेजुएट को हर महीने 3,000 और डिप्लोमा होल्डर बेरोजगार को 1,500 रुपये की मदद.
5. शक्ति योजना के तहत सभी महिलाओं को सरकारी बसों में फ्री यात्रा की सुविधा.

कैसे कर्जदार बन रहे राज्य?

– कमाई कम और खर्चा ज्यादा होगा तो इस खर्च को पूरा करने के लिए कर्ज लेना होगा. लेकिन खर्च और कर्ज को सही तरीके से मैनेज नहीं किया गया तो हालात ऐसे हो जाएंगे कि फिर न तो खर्च करने के लायक रहेंगे और न ही कर्ज लेने के.

– हमारे देश में भी सरकारों का कर्जा बढ़ता जा रहा है. सरकारें सब्सिडी के नाम पर फ्रीबीज पर बेतहाशा खर्च कर रही हैं. इन्हें दो आंकड़ों से समझिए. पहला कि पांच साल में राज्य सरकारों का सब्सिडी पर खर्च 60% से ज्यादा बढ़ गया है. और दूसरा कि पांच साल में ही राज्य सरकारों पर कर्ज भी लगभग 60% तक बढ़ा है.

– आरबीआई के मुताबिक, 2018-19 में सभी राज्य सरकारों ने सब्सिडी पर 1.87 लाख करोड़ रुपये खर्च किए थे. ये खर्च 2022-23 में बढ़कर 3 लाख करोड़ रुपये के पार चला गया है. इसी तरह से मार्च 2019 तक सभी राज्य सरकारों पर 47.86 लाख करोड़ रुपये का कर्ज था, जो मार्च 2023 तक बढ़कर 76 लाख करोड़ से ज्यादा हो गया.

– अकेले कर्नाटक का सब्सिडी पर खर्च चार साल में 12 फीसदी तक बढ़ गया है. इतना ही नहीं, पांच साल में ही कर्नाटक का कर्ज 87 फीसदी बढ़ गया है. मार्च 2019 तक कर्नाटक पर 2.86 लाख करोड़ रुपये का कर्ज था, जो मार्च 2023 तक बढ़कर 5.35 लाख करोड़ रुपये हो गया.

फ्रीबीज का असर क्या होता है?

– राजनीतिक पार्टियां चुनाव जीतने के लिए वादों की बौछार तो कर देती हैं, लेकिन इसका बोझ सरकारी खजाने पर पड़ता है. सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था कि टैक्सपेयर के पैसे का इस्तेमाल कर बांटी जा रहीं फ्रीबीज सरकार को ‘दिवालियेपन’ की ओर धकेल सकती हैं.

– इतना ही नहीं, पिछले साल आरबीआई की भी एक रिपोर्ट आई थी. इसमें कहा गया था कि राज्य सरकारें मुफ्त की योजनाओं पर जमकर खर्च कर रही हैं, जिससे वो कर्ज के जाल में फंसती जा रही हैं.

– ‘स्टेट फाइनेंसेस: अ रिस्क एनालिसिस’ नाम से आई आरबीआई की इस रिपोर्ट में उन पांच राज्यों के नाम दिए गए हैं, जिनकी स्थिति बिगड़ रही है. इनमें पंजाब, राजस्थान, बिहार, केरल और पश्चिम बंगाल शामिल हैं.

– आरबीआई ने अपनी इस रिपोर्ट में CAG के डेटा के हवाले से बताया है कि राज्य सरकारों का सब्सिडी पर खर्च लगातार बढ़ रहा है. 2020-21 में सब्सिडी पर कुल खर्च का 11.2% खर्च हुआ था, जबकि 2021-22 में 12.9% खर्च किया गया.

– रिपोर्ट में कहा गया था कि अब राज्य सरकारें सब्सिडी की बजाय मुफ्त ही दे रही हैं. सरकारें ऐसी जगह पैसा खर्च कर रही हैं, जहां से उन्हें कोई कमाई नहीं हो रही. फ्री बिजली, फ्री पानी, फ्री यात्रा, बिल माफी और कर्ज माफी, ये सब ‘freebies’ हैं, जिन पर राज्य सरकारें खर्च कर रही हैं.

– राज्यों के घटते राजस्व में इजाफे के लिए एन.के. सिंह की अगुआई वाले 15वें वित्त आयोग ने संपत्ति कर में धीरे-धीरे बढ़ोतरी, पानी जैसी विभिन्न सरकारी सेवाओं का शुल्क नियमित तौर पर बढ़ाने के साथ शराब पर उत्पाद कर बढ़ाने और स्थानीय निकायों तथा खाता-बही में सुधार करने की सलाह दी है.

– पिछले साल जून में आरबीआई ने अपनी रिपोर्ट में श्रीलंका के आर्थिक संकट का उदाहरण देते हुए सुझाव दिया है कि राज्य सरकारों को अपने कर्ज में स्थिरता लाने की जरूरत है, क्योंकि कई राज्यों के हालात अच्छे संकेत नहीं हैं.

– आरबीआई का सुझाव है कि सरकारों को गैर-जरूरी जगहों पर पैसा खर्च करने से बचना चाहिए और अपने कर्ज में स्थिरता लानी चाहिए. इसके अलावा बिजली कंपनियों को घाटे से उबारने की जरूरत है. इसमें सुझाव दिया गया है कि सरकारों को पूंजीगत निवेश करना चाहिए, ताकि आने वाले समय में इससे कमाई हो सके.

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