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UPA का वो दौर जब विपक्ष ने तत्कालीन पीएम को संसद में जवाब देने को किया मजबूर

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नई दिल्ली,

संसद का मानसून सत्र चल रहा है. लेकिन भारी हंगामे के कारण यह स्थगित हो जा रहा है. आज भी बिना किसी सार्थक चर्चा के लोकसभा के सत्र को एक दिन के लिए स्थगित कर दिया गया. दरअसल विपक्ष मणिपुर के मुद्दे को लेकर चर्चा करना चाहता है. सत्ताधारी भाजपा भी कह रही है कि हम इस विषय पर चर्चा को तैयार हैं. लेकिन फिर भी संसद का सत्र हंगामे की भेंट चढ़ता है और स्थगित कर दिया जाता है. विपक्षी नेता प्रधानमंत्री मोदी की चुप्पी पर भी निशाना साध रहे हैं. संसद के मानसून सत्र की शुरुआत के दौरान पीएम मोदी ने इस मुद्दे पर अपनी बात रखी थी. पीएम मोदी ने कहा था कि यह घटना शर्मसार करने वाली है, दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा.

दरअसल विपक्षी दल मणिपुर मुद्दे पर सदन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान की मांग कर रहे हैं, जिसके कारण संसद के मानसून सत्र में व्यवधान देखने को मिल रहा है. ऐसे में यह याद करना भी जरूरी है कि यूपीए सरकार के दौरान सदन की स्थिति क्या रहती थी. आपको बता दें कि UPA सरकार के दौरान ऐसे कई मौके आए जब विपक्ष यानी बीजेपी की मांग पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संसद में बयान दिया था. आइए जान लेतें हैं वो मुद्दे कौन से रहे…

CVC नियुक्ति मुद्दे पर पीएम ने मांगी माफी
4 मार्च, 2011: केंद्रीय सतर्कता आयुक्त के रूप में पी.जे. थॉमस की नियुक्ति का मुद्दा संसद में गूंजा. तब विपक्ष ने मांग की कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पूरे प्रकरण पर बयान दें. विपक्ष की मांग को मानते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को संसद में आकर बयान देना पड़ा.

दरअसल 7 मार्च, 2011 को केंद्रीय सतर्कता आयुक्त के रूप में पी.जे.थॉमस की नियुक्ति को गलती बताते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि वह इसके लिए पूरी जिम्मेदारी लेते हैं. उन्होंने लोकसभा में कहा, ‘हम सुप्रीम कोर्ट के फैसले को स्वीकार करते हैं और उसका सम्मान करते हैं. सरकार नए सीवीसी की नियुक्ति करते समय कोर्ट द्वारा दिए गए दिशानिर्देशों/निर्देशों को ध्यान में रखेगी.’

कोयला ब्लॉक आवंटन में अनियमितताएं
3 जून, 2012: भारतीय जनता पार्टी ने कहा कि टीम अन्ना द्वारा कोयला ब्लॉकों के आवंटन में कथित भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाना प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा संसद में स्पष्टीकरण की विपक्ष की मांगों का जवाब देने से झिझकने का स्वाभाविक परिणाम था. इसके बाद 27 अगस्त, 2012 को कोयला ब्लॉक आवंटन में लगाए गए आरोपों को आधारहीन बताते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि सीएजी द्वारा की गई टिप्पणियां कई मायनों में गलत हैं. उन्होंने विपक्ष से इस मुद्दे पर संसद में बहस करने का भी आग्रह किया ताकि ‘देश यह तय कर सके कि सच्चाई कहां है.’ साल 2005-2009 के दौरान आवंटन को लेकर प्रधानमंत्री पर हमले हो रहे थे, जब उनके पास कोयला विभाग था, वह पिछले सप्ताह से बयान देने का इंतजार कर रहे थे, लेकिन विपक्ष, मुख्य रूप से भाजपा के व्यवधान के कारण ऐसा नहीं कर सके.

कोयला ब्लॉक आवंटन की फाइलें गायब
20 अगस्त, 2013: सरकार पर कोयला घोटाले को छुपाने का आरोप लगाते हुए, भाजपा ने कोयला ब्लॉक आवंटन पर गायब फाइलों पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से बयान की मांग करते हुए संसद को बाधित कर दिया. इसके 10 दिन बाद यानी 30 अगस्त, 2013 को कोयला खदानों के आवंटन से संबंधित गुम फाइलों को लेकर हमले के बीच, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि वह कोयला मंत्रालय की फाइलों के संरक्षक नहीं हैं. उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि किसी भी दोषी व्यक्ति को सरकार द्वारा बचाया नहीं जाएगा. कोयला ब्लॉक आवंटन समेत अनियमितताओं को लेकर भाजपा सदस्यों के सवालों का जवाब दिया था.

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