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सरकार के चीफ इकनॉमिस्‍ट को क्‍यों आपकी सैलरी की चिंता? दे दी है बड़ी चेतावनी

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नई दिल्‍ली:

भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी अनंत नागेश्वरन ने चेतावनी दी है। उन्‍होंने कहा है कि कंपनियां ज्यादा मुनाफा कमा रही हैं। लेकिन, कर्मचारियों को कम वेतन दे रही हैं। यह स्थिति अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह हो सकती है। जीडीपी में गिरावट, बढ़ती महंगाई और शहरी खपत में कमी के बीच वेतन में बढ़ोतरी पर फोकस है। नागेश्वरन ने निजी क्षेत्र से अधिक लोगों को रोजगार देने और कैपिटल इंटेंसिव और लेबर-इंटेंसिव ग्रोथ के बीच सही संतुलन बनाने की अपील की है। उन्होंने बताया कि सूचीबद्ध कंपनियों का मुनाफा जीडीपी के प्रतिशत के रूप में 15 साल के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है। लेकिन, वेतन वृद्धि धीमी हो गई है। इसके अलावा, ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, महामारी के बाद पहली बार भारतीय वेतन में पिछली तिमाही में गिरावट आई है। इससे उपभोक्ता खर्च और कॉर्पोरेट मुनाफे पर असर पड़ा है।

सीईए नागेश्वरन ने इस बात पर जोर दिया कि कंपनियों की आय का एक उचित हिस्सा मुनाफे और कर्मचारियों के वेतन के रूप में जाना चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता है तो कंपनियों के उत्पादों को खरीदने के लिए अर्थव्यवस्था में पर्याप्त मांग नहीं होगी। इनकम ग्रोथ से खपत और बचत दोनों को बढ़ावा मिलता है। इससे आर्थिक विस्तार होता है।’

नागेश्‍वरन ने क‍िया आगाह
नागेश्वरन बोले, ‘दूसरे शब्दों में अच्छा वेतन न देना या पर्याप्त श्रमिकों को नौकरी पर न रखना कॉर्पोरेट क्षेत्र और छोटे उद्यमों के लिए आत्म-विनाशकारी या हानिकारक होगा।’ उन्होंने यह भी याद दिलाया कि प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एडम स्मिथ ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द वेल्थ ऑफ नेशंस’ से पहले ‘द थ्योरी ऑफ मॉरल सेंटीमेंट्स’ लिखी थी।

मोतीलाल ओसवाल की रिपोर्ट के अनुसार, Nifty-500 कंपनियों का मुनाफा पिछले वित्त वर्ष में जीडीपी के 4.8% तक पहुंच गया, जो 2007-08 के उछाल वाले वर्ष (वैश्विक वित्तीय संकट से पहले) में 5.2% की ग्रोथ के बाद सबसे अधिक है। सीईए ने स्वीकार किया कि कंपनियों ने अपने मुनाफे का एक हिस्सा कर्ज चुकाने के लिए इस्तेमाल किया है और उनकी बैलेंस शीट स्वस्थ हो गई है। लेकिन, अब समय आ गया है कि वे पूंजी निर्माण और रोजगार वृद्धि के अच्छे कॉम्बिनेशन में शामिल हों।

क्‍या है सरकार की च‍िंंता?
भारतीय वेतन में पिछली तिमाही में महामारी के बाद पहली बार गिरावट आई है। इससे अर्थव्यवस्था की गति धीमी हो गई है। कारण है कि उपभोक्ताओं ने खर्च कम कर दिया है। कॉर्पोरेट मुनाफे में गिरावट आई है।

पिछले तीन से चार महीनों में शहरी खर्च में कमी ने न केवल सबसे बड़ी उपभोक्ता वस्तु कंपनियों की कमाई को नुकसान पहुंचाया है। अलबत्‍ता, इससे भारत की दीर्घकालिक आर्थिक सफलता की संरचनात्मक प्रकृति के बारे में भी सवाल उठे हैं। महामारी खत्‍म होने के बाद से भारत की इकनॉमिक ग्रोथ काफी हद तक शहरी खपत से प्रेरित रही है जो अब बदलती हुई दिखाई दे रही है।

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