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रिटायर तो होंगे येदियुरप्पा, क्या उन्हें किनारे लगा पाएगी BJP? कर्नाटक चुनाव की मजबूरी तो समझिए

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बेंगलुरू

पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के संरक्षक बीएस येदियुरप्पा अगले साल विधायक के रूप में अपना कार्यकाल खत्‍म होने पर चुनावी राजनीति से संन्यास ले सकते हैं। उन्‍होंने चुनाव नहीं लड़ने का ऐलान किया है। इसका मतलब यह भी है कि तीन दशकों में केवल दूसरी बार बीजेपी येदियुरप्पा के बिना विधानसभा चुनाव का सामना करेगी। राज्य में बीजेपी प्रमुख बनने के बाद वे हमेशा ही मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार रहे हैं।

एक कठोर आरएसएस स्वयंसेवक और लिंगायत समुदाय से आने वाले 79 वर्षीय येदियुरप्पा को पार्टी राज्‍य में मजबूत बनाने का श्रेय जाता है। 1983 में उन्‍होंने अपना अभियान शुरू किया था और उन्होंने अंततः 2008 में भगवा पार्टी को सत्ता में पहुंचा दिया जो क‍ि दक्षिण भारत में पहली बार हुआ था। बीजेपी को ऐसी सफलता दक्षिण के दूसरे राज्‍यों में नहीं मिली।

येदियुरप्पा के पास चार बार मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड भी है, हालांकि उन्होंने कभी भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया। इनमें से दो कार्यकाल एक सप्ताह से भी कम समय तक चले। लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने 2004 के बाद से हर लोकसभा चुनाव में कर्नाटक की 28 सीटों में से 50% से अधिक सीटों पर भाजपा की जीत सुनिश्चित की। यह उपलब्धि 2019 के चुनावों में चरम पर पहुंच गई जब भाजपा ने 25 सीटें जीतीं।

क्‍या अगले विधानसभा चुनाव में बीजेपी का साथ देंगे?
2012 में येदियुरप्पा ने भाजपा छोड़ दी और अपनी पार्टी कर्नाटक जनता पक्ष की स्थापना की। 2013 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी पर इसका बड़ा असर पड़ा था। तो क्या येदियुरप्पा की अनुपस्थिति का असर अगले साल के चुनावों में पार्टी पर पड़ेगा? इस बारे में राजनीत‍ि वैज्ञानिक संदीप शास्‍त्री ने हमारे सहयोगी टीओआई से कहा, ‘वास्तव में नहीं। जब येदियुरप्पा ने पिछले साल मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया तो सभी जानते थे कि वह किसी अन्य राजनीतिक पद पर नहीं रहेंगे। तब से उन्होंने मेंटर की भूमिका निभाई है। उन्होंने अगले चुनाव में 150 सीटें जीतने के अपने लक्ष्य को हासिल करने में मदद करने के लिए राज्य का दौरा करने और भाजपा के लिए प्रचार करने का वादा किया है।’

लेकिन अब वह कितने प्रभावी हो सकते हैं, जबकि पार्टी में उनका कोई पद नहीं है? शास्त्री ने कहा: ‘प्रभाव दो कारकों पर निर्भर करेगा: केंद्रीय नेतृत्व उन्हें जमीन पर जो भूमिका और महत्व देता है; और नेतृत्व किस हद तक उसकी मांगों और अपेक्षाओं को समायोजित करने के लिए तैयार है।’

लिंगायत समुदाय प्रभाव
लेकिन एक अन्य राजनीतिक विश्लेषक, रवींद्र रेशमे ने कहा, ‘भाजपा के पास सत्ता में लौटने के लिए येदियुरप्पा पर भरोसा करने के अलावा बहुत कम विकल्प होगा, क्योंकि न केवल लिंगायत समुदाय पर उनके अद्वितीय प्रभाव के कारण, जिसे सबसे बड़ा माना जाता है जिनकी संख्‍या राज्‍य में 17-18 % है। इसलिए, चुनाव से उनकी सेवानिवृत्ति के बाद भी येदियुरप्पा प्रासंगिक बने रहेंगे।’

एक राजनीतिक टिप्पणीकार, विश्वास शेट्टी कहते हैं क‍ि मुझे नहीं लगता कि येदियुरप्पा के चुनावी राजनीति छोड़ने के फैसले का कोई बड़ा प्रभाव पड़ेगा। क्योंकि वह अगले साल 80 वर्ष के हो जाएंगे। उन्हें अपने बेटे विजयेंद्र के बजाय पार्टी की संभावनाओं पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि बीजेपी की जीत से उनके बेटे को अपने आप कैबिनेट बर्थ मिल जाएगी। लेकिन पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारियों और विश्वासपात्रों का कहना है कि उनके पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए येदियुरप्पा का राजनीतिक मृत्युलेख लिखना जल्दबाजी होगी।

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