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मणिपुर में सेना और असम राइफल्स ने बढ़ाई गश्त, उपद्रवियों के खिलाफ जारी हैं खुफिया ऑपरेशन

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इंफाल,

मणिपुर में हिंसक घटनाओं के बाद वहां बड़े पैमाने पर सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की गई है. सेना और असम राइफल्स ने संवेदनशील, टकराव वाली जगहों के साथ-साथ इंफाल घाटी के आसपास के ऊंचे इलाकों में बड़े पैमाने पर तलाशी अभियान शुरू किया है. सेना और असम राइफल्स ने मणिपुर में 27 मई की सुबह से कांगचुक, मोटबंग, सैकुल, पुखाओ और सगोलमंग के क्षेत्रों में कई तलाशी अभियान शुरू किए हैं, ताकि इन क्षेत्रों में सक्रिय किसी भी सशस्त्र विद्रोहियों पर नज़र रखी जा सके.

ये ऑपरेशन मणिपुर राज्य में शांति और सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए सेना और असम राइफल्स के मौजूदा समग्र प्रयासों का हिस्सा है. सेना के जवान जंगली पहाड़ी इलाकों में काम करते हुए आधुनिक टेक्नोलॉजी से लैस हथियारों, उपकरणों और अन्य फोर्स मल्टीप्लायरों का उपयोग कर रहे हैं. बीती रात सेना और असम राइफल्स द्वारा लगातार गश्त की गई और इसकी बदौलत चुराचांदपुर और इंफाल पूर्वी जिले के एक-एक गांव में टकराव को रोककर जनहानि को रोका गया.

तीन मई से हो रही है हिंसा
आपको बता दें कि 3 मई को ऑल ट्राइबल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ मणिपुर (एटीएसयूएम) का ‘ट्राइबल सॉलिडेरिटी मार्च’ हिंसक हो उठा. इंफाल सहित कई जिलों से मार-काट, दंगों और तोड़-फोड़ की खबरें आईं. हालात पर काबू पाने के लिए सेना और असम राइफल्स ने फ्लैग मार्च निकाला. करीब 15,000 लोगों को प्रभावित इलाकों से निकालकर राहत शिविरों में ले जाया गया. सरकार ने दावा किया कि 60 लोग मारे गए और 200 से ज्यादा घायल हुए.

कब से जल रहा है मणिपुर?
तीन मई को ऑल ट्राइबल स्टूडेंट्स यूनियन मणिपुर (ATSUM) ने ‘आदिवासी एकता मार्च’ निकाला. ये रैली चुरचांदपुर के तोरबंग इलाके में निकाली गई. इसी रैली के दौरान आदिवासियों और गैर-आदिवासियों के बीच हिंसक झड़प हो गई. भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस के गोले दागे.

तीन मई की शाम तक हालात इतने बिगड़ गए कि राज्य सरकार ने केंद्र से मदद मांगी. बाद में सेना और पैरामिलिट्री फोर्स की कंपनियों को वहां तैनात किया गया. ये रैली मैतेई समुदाय की अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने की मांग के खिलाफ निकाली गई थी. मैतेई समुदाय लंबे समय से अनुसूचित जनजाति यानी एसटी का दर्जा देने की मांग हो रही है.

पिछले महीने मणिपुर हाईकोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस एमवी मुरलीधरन ने एक आदेश दिया था. इसमें राज्य सरकार को मैतेई समुदाय को जनजाति का दर्जा दिए जाने की मांग पर विचार करने को कहा था. इसके लिए हाईकोर्ट ने सरकार को चार हफ्ते का समय दिया है.
– मणिपुर हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद नगा और कुकी जनजाति समुदाय भड़क गए. उन्होंने 3 मई को आदिवासी एकता मार्च निकाला.

मैतेई क्यों मांग रहे जनजाति का दर्जा?
– मणिपुर में मैतेई समुदाय की आबादी 53 फीसदी से ज्यादा है. ये गैर-जनजाति समुदाय है, जिनमें ज्यादातर हिंदू हैं. वहीं, कुकी और नगा की आबादी 40 फीसदी के आसापास है.

– राज्य में इतनी बड़ी आबादी होने के बावजूद मैतेई समुदाय सिर्फ घाटी में ही बस सकते हैं. मणिपुर का 90 फीसदी से ज्यादा इलाकी पहाड़ी है. सिर्फ 10 फीसदी ही घाटी है. पहाड़ी इलाकों पर नगा और कुकी समुदाय का तो घाटी में मैतेई का दबदबा है.

– मणिपुर में एक कानून है. इसके तहत, घाटी में बसे मैतेई समुदाय के लोग पहाड़ी इलाकों में न बस सकते हैं और न जमीन खरीद सकते हैं. लेकिन पहाड़ी इलाकों में बसे जनजाति समुदाय के कुकी और नगा घाटी में बस भी सकते हैं और जमीन भी खरीद सकते हैं.

– पूरा मसला इस बात पर है कि 53 फीसदी से ज्यादा आबादी सिर्फ 10 फीसदी इलाके में रह सकती है, लेकिन 40 फीसदी आबादी का दबदबा 90 फीसदी से ज्यादा इलाके पर है.

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