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प्रदेश के इन दो जगहों पर भी उठने लगी शराबबंदी की मांग, जानें क्या है करीला और जागेश्वरी धाम इतिहास

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अशोकनगर

मुख्यमंत्री मोहन यादव ने प्रदेश के 17 धार्मिक नगरों में शराब बंदी करने का अहम फैसला लिया है। जिसका स्वागत करते हुए अशोकनगर के पूर्व विधायक जजपाल सिंह जज्जी ने अशोकनगर जिले के करीला धाम ओर मां जागेश्वरी धाम चंदेरी में शराब बंदी करने के लिए मुख्यमंत्री मोहन यादव और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया से मांग की है। जज्जी ने कहा करीला धाम ओर मां जागेश्वरी धाम चंदेरी में शराब बंदी होने से धार्मिक, प्राकृतिक और सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ाबा मिलेगा ओर सनातन संस्कृति आगे बढ़ेगी।

दरसअल, पीएम मोदी के पर्यटन को बढ़ावा देने की पहल के अतर्गत सीएम मोहन यादव की अध्यक्षता में शुक्रवार को महेश्वर में देवी अहिल्याबाई के 300वीं जयंती वर्ष को समर्पित डेस्टिनेशन में कैबिनेट बैठक हुई। जिसमें प्रदेश के हित में बड़ा फैसला लिया गया है। इसमें राज्य सरकार 17 धार्मिक नगरों में शराबंदी का निर्णय लिया है। इन 17 नगरों में शराब दुकानें पूरी तरह बंद होगी और इनको दुकानों को दूसरी जगह पर शिफ्ट भी नहीं किया जाएगा।

शराबबंदी का यह फैसला एक अप्रैल से लागू होगा। इसी फैसले के तहत अशोकनगर जिले के करीला धाम ओर मां जागेश्वरी धाम चंदेरी में शराबबंदी की मांग पूर्व विधायक जजपाल सिंह जज्जी ने की है जिससे जिले के धार्मिक स्थलों पर भी शराब बंदी कराई जा सके।

अनोखा मंदिर जहां राम के बिना सीता की होती है पूजा
अशोकनगर में माता सीता का अनोखा मंदिर है। यहां बिना भगवान राम के सीता माता की आराधना की जाती है। इस तरह का पहला मंदिर श्रीलंका में स्थित है, तो दूसरा भारत में जहां माता सीता को बिना भगवान राम के पूजा जाता है। जिसे जानकी मंदिर करीला के नाम से जाना जाता है। इसका इतिहास भगवान राम से जुड़ा है। कहते हैं कि लंका से लौटने के बाद जब भगवान राम अयोध्या के राजा और माता सीता महारानी थीं, तब किसी अयोध्यावासी की बातों में आकर भगवान राम ने सीता का त्‍याग कर दिया था। तब लक्ष्‍मण सीता जी को करीला स्थित निर्जन वन में छोड़कर चले गए थे।

सीता माता ने करीला आश्रम में बिताया जीवन
भगवान लक्ष्मण करीला वन में रहकर गए थे। यहीं पर महर्षि वाल्मीकि का आश्रम था, जहां माता सीता ने अपना जीवन बिताया। यहीं पर उन्होंने अपने पुत्रों को जन्म दिया और दोनों ने यहीं शिक्षा दीक्षा ली। बताते हैं कि इसी जगह पर लव कुश ने भगवान राम के अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को पकड़कर बांध लिया था। साथी रंग पंचमी पर जहां अनोखा मेला लगता और यहां अपनी मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु राई नृत्य करवाते हैं। वहीं, मुख्यमंत्री मोहन यादव देश पर बनने वाले रामपथ से भी इसे जोड़ने की योजना सरकार बना रही है।

11वी सदी में निर्मित है चंदेरी का जागेश्वरी मंदिर
चंदेरी जहां अपने अति प्राचीन इतिहास के लिए जानी जाती है तो चंदेरी का अति प्राचीन जागेश्वरी मंदिर के नाम से भी चंदेरी को जाना जाता है। इस मन्दिर का निर्माण के उपरांत बुन्देला राजाओं के समय इस मन्दिर का विस्तार हुआ है। इस स्थल पर विराजमान गणेश जी की प्रतिमा पर उत्कीर्ण संवत् 1717 कार्तिक सुदी 11, (सन् 1660 ई.) के नागरी लिपि के अनुसार किसी धार्मिक महिला द्वारा यहां गणेश जी एवं भैरव देवजी की प्रतिमा उत्कीर्ण कराई थीं।

ऐसी मान्यता है जागेश्वरी माता मंदिर
चंदेरी नगर के इतिहासकार की माने तो बताया जाता है कि परवर्ती प्रतिहार वंश के सातवें राजा कीर्तिपाल (कूर्मदेव) के कुष्ठ रोग से पीड़ित हो गए। तब यहां के परमेश्वर तालाब से उनके कुष्ठ रोग का क्षय हुआ था। कुष्ठरोग से पीड़ित कूर्मदेव ने जब परमेश्वर के जल में स्नान किया तो उनके शरीर का सम्पूर्ण कुष्ठ रोग दूर हो गया। यह चमत्कार देख उन्होंने जोर-जोर से चिल्लाकर अदृश्य शक्ति रूपी ईश्वर का धन्यवाद दिया। तभी बालिका रूप में एक देवी प्रकट हुईं।
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देवी ने राजा से कहा कि आप जहां राजा शिशुपाल ने यज्ञ कराया था, उस स्थल पर एक मन्दिर का निर्माण कराएं और उस मन्दिर के निर्माण के पश्चात मन्दिर की शुद्धि कर मेरा आह्वान कर नौ दिवस के लिए मन्दिर के द्वार बन्द कर दें| मैं वहां अपने स्वरूप में स्वत: प्रकट हो जाऊंगी। लेकिन जिज्ञासावश मन्दिर के द्वार तीन दिन बाद ही खोल दिये। इस कारण यहां पर पर्वत में देवी जी का मात्र मुख ही प्रकट हो पाया। शेष शरीर प्रकट नहीं हो सका।

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