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Tuesday, December 9, 2025
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बांग्लादेश में एक और सियासी उठापटक की आहट? ढाका में ‘पहले से भी ज्यादा’ प्रदर्शन, फिर से सड़कों पर लोग

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ढाका

बांग्लादेश में इस साल जून में विरोध प्रदर्शन शुरू हुए थे। इसके नतीजे में शेख हसीना को 5 अगस्त को देश छोड़ना पड़ा था। हसीना सरकार गिरने और अंतरिम सरकार बने के बाद बहुत से लोगों को देश में एक नई सरकार की उम्मीद थी लेकिन ऐसा होता नहीं दिखा है। इसके उलट राजधानी ढाका में बीते कुछ समय में विरोध प्रदर्शनों की संख्या लगातार बढ़ रही है। अलग-अलग मुद्दों पर लोग सड़कों पर उतर रहे हैं।

फर्स्टपोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, ढाका में कई प्रोटेस्ट चल रहे हैं, इनमें से एक भूख हड़ताल कर रहे महबुल हक शिपॉन भी हैं। शिपॉन बांग्लादेश के राष्ट्रपति को हटाने की मांग कर रहे हैं। वह शेख हसीना के समय पद पर आए थे, ऐसे में शिपॉन उनको हटाने की मांग कर रहे हैं। शिपॉन के धरनास्थल के पास ही सरकारी कर्मचारी वेतन बढ़ाने के लिए सड़क पर हैं तो एक धरना धार्मिक मंदिरों की सुरक्षा के लिए चल रहा है। कई दूसरे मुद्दों पर भी लोग अपना विरोध जता रहे हैं।

ढाका में प्रदर्शनों पर अब कम ध्यान!
ढाका में प्रदर्शनों पर रिपोर्ट कहती है क मुख्य सड़कों पर कई रैलियां आयोजित की जा रही हैं। कपड़ा मजदूरों ने नवंबर में बड़ा प्रदर्शन करते हुए शहर के औद्योगिक क्षेत्रों में परिवहन रोक दिया था। छात्रों ने भी सचिवालय के बाहर सड़क को घंटों तक अवरुद्ध कर कई मांगे उठाई हैं। ढाका में आयोजित विरोध प्रदर्शनों की सटीक संख्या निर्धारित करना असंभव है, क्योंकि ज्यादातर प्रदर्शन पुलिस से पूर्व अनुमति के नियम को बाइपास करते हुए हो रहे हैं।

पुलिस अधिकारी मुहम्मद तालेबुर रहमान ने एएफपी को बताया, कुछ लोग नियमों का पालन करते हैं, जबकि कई नहीं करते हैं। इसलिए हम वास्तव में प्रदर्शनों की वास्तविक संख्या नहीं जानते हैं। माना जा रहा है कि मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली सरकार शेख हसीना के मुकाबले प्रदर्शनों के प्रति काफी हद तक सहिष्णु है। हालांकि हसीना की अवामी लीग पार्टी के बुलाए गए प्रदर्शनों पर सरकार सख्त है। अंतरिम सरकार ने कहा है कि अवामी लीग को रैली की अनुमति नहीं मिलेगी।

मोहम्मद यूनुस ने सत्ता संभालने के बाद प्रदर्शनों में हिंसा नहीं हुई है। हालांकि कुछ अवसरों पर विरोध प्रदर्शनों की वजह से अव्यवस्था हुई है। अधिकार समूह सलीश केंद्र के अहमद फैजुल कबीर का कहना है कि भाषण की स्वतंत्रता मौलिक अधिकार है लेकिन उन्हें दूसरों के अधिकारों का उल्लंघन नहीं करना चाहिए।

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