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SURESH BISHNOI IN KAINCHI DHAM: 1500 KM पैदल चल कर कैंची धाम पहुंचे 30 दिन बाद खाया खाना

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SURESH BISHNOI IN KAINCHI DHAM: जब आस्था संकल्प में बदल जाती है तो दूरी और मुश्किलें मायने नहीं रखतीं. ऐसा ही एक उदाहरण राजस्थान के निवासी और पेशे से सरकारी शिक्षक सुरेश बिश्नोई ने पेश किया है. उन्होंने बाबा नीम करोली महाराज से सपने में आदेश मिलने के बाद 1500 किलोमीटर पैदल यात्रा कर कैंची धाम पहुँचने का फैसला किया. एक कठिन यात्रा के बाद वे अब धाम पहुँच चुके हैं

ETV भारत से बातचीत में राजस्थान के सांचौर ज़िले के भाटीप गाँव निवासी सुरेश बिश्नोई ने बताया कि उन्होंने अपनी यात्रा 17 मई को शुरू की थी. वे 30 दिनों की कठिन यात्रा के बाद 15 जून को कैंची धाम पहुँचे. यह तारीख़ ख़ास है क्योंकि इसी दिन बाबा नीम करोली के कैंची धाम आश्रम का स्थापना दिवस मनाया जाता है जिसमें लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं.

30 दिन सिर्फ़ जूस और फल

सुरेश की यात्रा को और भी असाधारण बनाता है उनका भोजन का त्याग. इस पूरी यात्रा के दौरान, उन्होंने केवल जूस और फलों के सहारे ही सफ़र तय किया है. सुरेश बताते हैं कि उन्हें नीम करोली बाबा के बारे में पहली बार तब पता चला जब वे अपनी बी.एड. की परीक्षा देने हल्द्वानी में उत्तराखंड ओपन यूनिवर्सिटी आए थे.

बिना सोचे चल पड़े बाबा के दरबार

बाबा के बारे में पढ़ते-पढ़ते उनका विश्वास इतना मज़बूत हो गया कि एक दिन बाबा ने उन्हें सपने में कैंची धाम आने का आदेश दिया. अगले ही दिन उन्होंने न देर की और न ही कोई शंका. उन्होंने बस अपना बैग कंधे पर उठाया चप्पल पहनी और बाबा के दरबार की ओर पैदल चल पड़े. आखिरकार वे बाबा नीम करोली के धाम पहुँच गए हैं, जहाँ उनकी आस्था पूरी हुई है.

पैदल निकले तीर्थ यात्रा पर

सुरेश की यात्रा सिर्फ़ व्यक्तिगत आस्था तक सीमित नहीं है. सुरेश समाज को जागरूक करने का संदेश भी साथ लेकर चल रहे हैं. अपनी इस संकल्प यात्रा के माध्यम से वे पाँच प्रमुख संदेश देना चाहते हैं. हालांकि, यहाँ वे संदेश स्पष्ट नहीं किए गए हैं, लेकिन उनका उद्देश्य निश्चित रूप से सामाजिक हित में होगा.

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रास्ते में जहाँ भी उन्हें कोई मंदिर या धर्मशाला मिलती है, सुरेश वहीं रुकते हैं और आराम करते हैं. अगली सुबह वे फिर यात्रा पर निकल पड़ते हैं. सुरेश का मानना है कि बाबा नीम करोली के आशीर्वाद और नाम से हर मुश्किल आसान हो जाती है. 15 जून को उन्होंने कैंची धाम में बाबा के दर्शन किए और एक महीने बाद मालपुए का प्रसाद खाकर भोजन ग्रहण किया. उनकी यह यात्रा प्रेरणा आस्था संकल्प और सामाजिक चेतना का एक जीता-जागता उदाहरण है.

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अस्वीकरण: व्यक्ति की आस्था और अनुभव व्यक्तिगत होते हैं. यात्रा का विवरण उनके स्वयं के कथन पर आधारित है.

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