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मैटरनिटी लीव संवैधानिक गारंटी है, सुप्रीम कोर्ट ने तीसरे बच्चे के लिए छुट्टी देने से मना करने वाला हाईकोर्ट का आदेश किया खारिज

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नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मैटरनिटी लीव यानी मातृत्व अवकाश महिलाओं का संवैधानिक अधिकार है। यह सिर्फ एक अच्छा नियम या सामाजिक न्याय का मामला नहीं है। कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें एक सरकारी टीचर को तीसरे बच्चे के जन्म पर मैटरनिटी लीव देने से मना कर दिया गया था।

जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने कहा कि मैटरनिटी लीव का मकसद महिलाओं को सामाजिक न्याय दिलाना है। इससे महिला न सिर्फ अपना गुजारा कर पाती है, बल्कि अपनी खोई हुई ताकत को भी वापस पा सकती है। वह अपने बच्चे की देखभाल कर सकती है, एक कर्मचारी के तौर पर अपनी क्षमता बनाए रख सकती है और पहले जैसी कुशलता से काम कर सकती है।

महिलाओं के साथ सम्मान से पेश आएं-सुप्रीम कोर्ट
बेंच ने कहा, “आजकल महिलाएं वर्कफोर्स का एक बड़ा हिस्सा हैं। इसलिए, उनके साथ सम्मान और गरिमा से पेश आना चाहिए…। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी बताया कि गर्भावस्था का एक महिला कर्मचारी के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर क्या असर होता है। यह सिर्फ मातृत्व नहीं है, बल्कि बच्चे को भी खास ध्यान देने की जरूरत है।”

मद्रास हाई कोर्ट ने मैटरनिटी लीव देने से मना किया था
HC ने मैटरनिटी लीव देने से इसलिए मना कर दिया था क्योंकि राज्य सरकार की एक नीति है। इस नीति के अनुसार, जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए दो से ज्यादा बच्चों के जन्म पर मैटरनिटी लीव नहीं दी जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट का फैसला रद्द किया
SC ने HC के फैसले को रद्द करते हुए कहा कि महिला का तीसरा बच्चा उसकी दूसरी शादी से हुआ था। कोर्ट ने कहा, “हर महिला को राज्य के अनुचित हस्तक्षेप के बिना प्रजनन संबंधी फैसले लेने का अधिकार है। यह मानवीय गरिमा का एक अहम हिस्सा है। प्रजनन स्वास्थ्य सेवा या भावनात्मक और शारीरिक कल्याण तक पहुंच से वंचित करना भी महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाता है।” बच्चे पैदा करने के बारे में फैसला लेने का अधिकार हर महिला का है और सरकार को इसमें बेवजह दखल नहीं देना चाहिए। अगर किसी महिला को यह अधिकार नहीं मिलता है, तो यह उसकी गरिमा का अपमान है।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला महिलाओं के अधिकारों के लिए एक बड़ी जीत है। यह फैसला बताता है कि मैटरनिटी लीव सिर्फ एक सुविधा नहीं है, बल्कि यह महिलाओं का संवैधानिक अधिकार है। कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया है कि सरकार जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर महिलाओं के अधिकारों को नहीं छीन सकती है। यह फैसला उन महिलाओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण है जो सरकारी नौकरी में हैं और जिनके दो से ज्यादा बच्चे हैं।

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